बैगा आदिवासी भीषण ठंड में खुले बदन गर्म कपडों के अभाव में आसमान के नीचे रात गुजार रहे

3:00 pm or December 25, 2021

आनंद ताम्रकार

बालाघाट २५ दिसंबर ;अभी तक;  बालाघाट जिले में दक्षिण बैहर क्षेत्र का अधिकांश भाग घने जंगल और पहाडों से आच्छादित है इस भू भाग का ज्यादातर हिस्सा नक्सली प्रभावित क्षेत्र में आता है। बैगा आदिवासीयों की जमात इस क्षेत्र में घनेजंगल में खुले आसमान के नीचे झोपडी बनाकर रही है। कुछ गांव तो ऐसे है जहां 10 से 15 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचना पड़ता है।

                 इन दिनों भीषण ठंडी पड़ रही है रूह कपा देने वाली शीत लहर के प्रकोप से सारा इलाका प्रभावित है कई इलाकों में पेडों पर बर्फ जैसी चादर दिखाई दे रही है लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है वहीं दुसरी तरफ बैगा आदिवासी इस भीषण ठंडी में खुले बदन गर्म कपडों के अभाव में आसमान के नीचे रात गुजार रहे है। ठंड से बचने के लिये 24 घंटे वे लकडी जलाकर आग के अलाव से अपना शरीर गर्म करने मजबूर है।

                    उल्लेखनीय है की बैगा जनजाति को राष्ट्रीय मानव को दर्जा दिया गया है लेकिन ज्यादातर आबादी बुनियादी सुविधाओं के लिये मोहताज है।

                   इन विसंगतियों के बीच जिले वरिष्ठ पत्रकार रफीक अंसारी जो इस इलाके के गांव और पहुंच मार्ग से परिचित है वे प्रबुद्ध तथागत फाउंडेशन जिसके संचालक उत्तर प्रदेश के वरिष्ट प्रशासनिक अधिकारी श्री मुकेश मेश्राम और उनकी पत्नी है उनके द्वारा इन बैगा आदिवासियों के बीच पहुंचकर बैगाओं को राहत सामग्री बाट रहें है जिसमें दवाईयां,गर्म कपड़े, रोजाना उपयोग की आवश्यक भोजन सामग्री और कंबल बाट रहें है। अब तक इस संस्था के माध्यम से श्री अंसारी एवं प्रबुद्ध तथागत फाउंडेशन टीम ने लांजी तहसील सायर,टेमनी,संदुका, नलेझरी,नरपी,चिरकोना,केरडेही,खामा देही,बोदरा,बिरसा क्षेत्र के मछुरदा, गठिया ,कोरका, बोदरी, अडोरी, सोनगुड्डा, कोदापार,रासीमेटा, घुमर सहित बैहर तथा परसवाड़ा क्षेत्र के ऐसे अनेक गांव है जहां इस भीषण ठंडी में बिना कपडे के लोग केवल आग के सहारे अपना जीवन गुजर बसर कर रहे है।

              आजादी हासिल होने के 75 वर्श बीत जाने के बाद भी बैगा आदिवासियों के विकास के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च कर दिये गये इसके बावजूद आज बैगा आदिवासी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।