भगवान नेमीनाथजी का जन्म कल्याणक महोत्सव मना, नाटिका का हुआ मंचन

5:17 pm or August 2, 2022
महावीर अग्रवाल 
मन्दसौर २ अगस्त ;अभी तक;  कल मंगलवार को नईआबादी स्थित आराधना भवन मंदिर हाल में आयोजित कार्यक्रम में जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथजी का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। आचार्य श्री यशोभद्रसूरिश्वरजी म.सा., आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. आदि ठाणा 8 की पावन  प्रेरणा व निश्रा में आराधना भवन श्री संघ के द्वारा प्रभु नेमीनाथजी का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्मकल्याणक के उपलक्ष्य में आराधना भवन मंदिर हाल में प्रभु नेमीनाथजी के जन्म का वृतान्त बताने वाली नाटिका की प्रस्तुति हुई। आराधना भवन श्रीसंघ से जुड़े परिवारों ने प्रभु नेमीनाथजी के माता-पिता, सौधर्म इन्द्रप्रियवंदा दासी बनकर प्रभु नेमीनाथजी के जन्म के समय हुई घटनाओं की प्रस्तुति दी। संगीतकार लक्षित जैन ने पूरे कार्यक्रम में एक के बाद एक गीतों की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में समा बांध दिया। इस अवसर पर श्रीसंघ से जुड़े परिवारों की 14 कन्याओं ने प्रभु नेमीनाथजी की माता शीवादेवी के सपने में आये 14 सपनाजी का प्रदर्शन किया तथा नृत्य भी किया।
                            नाटिका में प्रभु नेमीनाथजी के पिता समुन्द्रविजय की भूमिका विजय रांका एवं माता की भूमिका उनकी धर्मपत्नी ने निभाई। सौधर्म इन्द्र का अभिनय पारस मेहता एवं इन्द्राणी का अभिनय उनकी धर्मपत्नी ने किया। प्रियवंदा दासी की भूमिका नितांशी जेतावत ने निभाई। सभी पात्रों ने भगवान नेमीनाथजी के जन्म के समय हुई घटनाओं का नाटिका के माध्यम से मंचन किया। नाटिका के उपरांत प्रभु नेमीनाथजी की प्रतिमा का अभिषेक किया गया। बड़ी संख्या में श्रावक श्राविका ने इस मौके पर सहभागिता करते हुए प्रभु नेमीनाथजी के जयकारे लगाये। नाटिका के मंचन में दिलीप रांका, पायल जैन एवं अन्य धर्मालुजनों ने  भी सहयोग प्रदान किया।
                    संगीतकार लक्षित जैन ने प्रभु नेमीनाथजी के कई गीतों की अद्भूत प्रस्तुतियां भी दी जिस सभी ने सराहा। उन्होने ‘‘मेरे सिर पर रख दो दादा अपने ये दोनों हाथ देना है तो दीजिये जन्म जन्म का साथ।’’ गीत भी प्रस्तुत किया। यह उल्लेखनीय है कि प्रभु नेमीनाथजी भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन है तथा वे कृष्ण के चहेते भाई थे।
                           आचार्य श्री पियुषसूरिश्वर जी ने कहा कि प्रभु नेमीनाथजी का पूरा जीवन तप व करूणा की अनुपम मिसाल है। राजवंश में जन्म लेने वाले प्रभु नेमीनाथ ने संयम जीवन ग्रहण कर मोक्ष का मार्ग चुना। उनका पूरा जीवन अनुकरणीय है, वंदनीय है। प्रभु नेमीनाथजी के विवाह के समय पशु बाड़े में बांधकर रखेहुए थे जब उन्होनंे पशुओं को देखा तो  उन्होंने पूछा कि यह पशु यहां क्यों रखे है। पूछने पर यह पता  चला कि विवाह समारोह में जो लोग शामिल होगे उनके भोजन के लिये इन पशुओं की बलि होगी तो प्रभु नेमीनाथजी ने विवाह करने से इंकार कर दिया और संयम जीवन ग्रहण कर लिया। उनके मन में जीव मात्र के लिये दया, करूणा का भाव था। उन्होंने कृष्ण को द्वारिका  की रक्षा के लिये, आयंबिल तप करने एवं कराने की प्रेरणा भी दी थी। उन्हीं की प्रेरणा के कारण द्वारिका नगरी कई वर्षों तक सुरक्षित रही। धर्मसभा का संचालन दिलीप राका ने किया।