भादवा बीज बाबा रामदेव के जन्मदिन पर विशेष ; हिंदू जीवन जीते हुए बाबा रामदेव ने समस्त धर्मों का आदर किया

महावीर अग्रवाल
   मन्दसौर ७ सितम्बर ;अभी तक;      मुगल शासन काल में अनेक हिंदू राजा -महाराजा शासन चलाने के साथ-साथ प्रजा के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम भी चलाते थे और प्रजा, स्वस्थ ,सुखी एवं संपन्न रहें इसलिए वह उनके हेतु भौतिक साधनों के साथ-साथ देविक चमत्कार के माध्यम से भी जनता की सेवा किया करते थे उस समय क्योंकि मुगल शासन काल था इसलिए अच्छे राजाओं के भक्त हिंदुओं सहित मुस्लिम समाज के लोग भी रहते थे तथा उक्त हिंदू राजा बिना किसी भेदभाव अथवा जातिगत पूर्वाग्रह से रहित होकर सभी का कल्याण करते थे और इस कारण से उन्हें हिंदू वीर मुसलमान पीर कहते थे इसी श्रृंखला में श्री अजमल देव के यहां माता मैना देवी के गर्भ से बाबा रामदेव ने भाद्र पक्ष द्वितीय विक्रम संवत 1462 में उंडू कश्मीर नामक स्थान जो अभी पोकरण के निकट स्थित है वहां जन्म लिया।
                ऐसा कहा जाता है कि संतान प्राप्ति की चाह में राजा अजमल ने विभिन्न तीर्थ स्थानों की यात्रा की किंतु जब वे निराश हुए तो उन्होंने द्वारकाधीश की मूर्ति के समक्ष रखा हुआ लड्डू क्रोध में आकर भगवान की मूर्ति पर दे मारा और जब द्वारकाधीश ने उन्हें स्वयं दर्शन दिए तो उन्होंने देखा कि उनके माथे पर पट्टी बंधी हुई है जब अजमल ने इसका कारण पूछा तो द्वारकाधीश ने कहा एक भक्त ने क्रोध में मुझे लड्डू मार दिया इसके कारण चोट लगी और यह पट्टी इसीलिए मेरे माथे पर  बंधी हुई है यह सुनकर अजमल को बड़ा पश्चाताप हुआ और उन्होंने भगवान द्वारकाधीश से बहुत क्षमा मांगी उसी समय भगवान द्वारकाधीश ने उन्हें वरदान दिया कि मैं रामदेव के नाम से तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लुंगा। जब रामदेव जी का जन्म हुआ तो अनेक प्रकार की चमत्कारिक घटनाएं घटी सारा वातावरण प्रसन्नता से भर उठा ।  प्रकृति में एक अलग ही तेज दिखाई देने लगा जब रामदेव जी थोड़े बड़े हुए तो उनके सामने अनेक प्रकार के खिलौने रखे गए किंतु उन्होंने बाल हट के स्वभाव के कारण घोड़े पर बैठने की मांग की यह सुनकर माता मैंना देवी ने दर्जी से कहकर तुरंत एक कपड़े का घोड़ा बनवाया जिस पर प्रसन्नता पूर्वक बालक रामदेव बैठ गए और देखते ही देखते वह घोड़ा प्राणवान हो गया और बालक रामदेव को आकाश में ले उड़ा।
                इस प्रकार बड़े होते-होते रामदेव जी ने कई चमत्कारिक और कल्याणकारी कार्य किए जिसके कारण उनकी विश्व में प्रसिद्धि फेल गई और उनकी सिद्धियों की चर्चा मुस्लिम समाज में भी होने लगी जिसके कारण कई मुसलमान उनके भक्त बन गए और जो हिंदू, मुसलमान बन गए थे वह अपना शुद्धिकरण कर वापस हिंदू धर्म में आ गए इसके कारण उस समय के मुगल बादशाह सहित इस्लाम के धर्मगुरु उलेमा अत्यंत ही चिंतित हुए ऐसा कहा जाता है कि मक्का से चलकर रामदेव की सिद्धि का परीक्षण करने के लिए पांच पीर आए थे किंतु बाबा रामदेव की चमत्कारी सिद्धियों के कारण वे उनके सामने नतमस्तक होकर बोले कि आप सच्चे हिंदवा पीर हैं आज से हम आपको रामापीर के नाम से संबोधित करेंगे और मुसलमान समाज भी आपको पीर मान कर पूजेंगे।
        श्री रामदेव तंवर राजपूत थे और उनके पूर्वजों ने मुगल शासन काल के अत्याचार के विरुद्ध अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध लड़े मुस्लिम शासन काल में जब बादशाह भी अपने धर्मगुरु और उलेमाओं की बात मानते थे उस काल में रामदेव जी के पूर्वज रणसी जी और खीवण जी ने उन उलेमाओं की कोई बात नहीं मानी और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए स्थान- स्थान पर भजन कीर्तन मंदिरों में पूजा अर्चना और मुस्लिम पीर पैगंबरों के चमत्कारों के विरुद्ध हिंदू धर्म को विश्वास में लेने के लिए उन्होंने भी अनेक चमत्कार किए इसी परंपरा को श्री रामदेव जी ने भी निभाया और युवावस्था तक उन्होंने अनेक चमत्कारों के माध्यम से हिंदू- मुस्लिम तथा जातिगत भेदभाव को भुलाकर सभी के लिए कल्याण की कामना की और अपने भक्तों को तथा राज्य की जनता को सुखी रखने का प्रयास किया। अनेक मुस्लिम पीर और उलेमाओं ने उनकी शक्ति के सामने अपने आप को समर्पित कर दिया और उन्हें रामापीर कहकर सम्मान प्रदान किया।
              बाबा रामदेव हिंदू धर्म और हिंदुत्व के पक्षधर थे वह हमेशा यह उपदेश देते थे की अमीरी हो या गरीबी, दुख हो या सुख, लाभ हो या हानि अथवा जीवन मरण हो मनुष्य को अपने धर्म में ही जीना चाहिए और अपने धर्म में मरना चाहिए।  आप हिंदू हैं तो हिंदू होकर मरे और आप मुसलमान हैं तो मुसलमान होकर मरे और भी किसी प्रकार के धर्मांतरण एवं अन्य धर्म की पूजा पद्धति को स्वीकार न करें और यही कारण है की बाबा रामदेव आज सभी धर्म और जातियों के लिए श्रद्धा और पूजा के पात्र हैं और भादो बीज पर लाखों भक्तगण जिसमें मुसलमान भी सम्मिलित हैं रामदेवरा में उपस्थित होकर इनके मंदिर में उनका प्रिय कपड़े का घोड़ा समर्पित करते हैं
               बाबा रामदेव ने भाद्र शुक्ल एकादशी को राजस्थान के रामदेवरा जो पोकरण से 10 किलोमीटर दूर है वहां जीवित समाधि ली थी। बाबा रामदेव सभी मनुष्य की समानता में विश्वास करते थे चाहे वह उच्च हो या निम्न अमीर हो या गरीब हो उन्होंने दलितों को उनकी इच्छा अनुसार फल देकर उनकी मदद की उन्हें अक्सर घोड़े पर सवार दर्शाया जाता है उनके अनुयायी राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, मुंबई, दिल्ली, भीलवाड़ा अन्य गांव के साथ-साथ जैसलमेर से सिंध तक है । राजस्थान में कई मेले आयोजित किए जाते हैं उनके मंदिर भारत में अनेक स्थानों पर मौजूद हैं।
रमेशचन्द्र चन्द्रे