भारत के इतिहास में पर्यावरणीय मूल्य का अध्ययन ; प्रो. उषा अग्रवाल प्राध्यापक – इतिहास शा.स्ना.महाविद्यालय,

महावीर अग्रवाल
, मन्दसौर  ४ जून ;अभी तक;  आज पर्यावरण संरक्षण वैश्विक स्तर पर विचारणीय विषय बन गया है। मानव से लेकर ब्रह्मांड तक विस्तृत स्वरूप लिये इस विषय का केन्द्र बिन्दू वैश्विक मानव है। मानव और पर्यावरण का संबंध प्रकृति एवं जीवन की भांति शाश्वत और प्रगाढ़ है। दोनों एक दूसरे से स्वतंत्र रहते हुए भी अन्योन्याश्रित है। मान व ही पर्यावरण से पीड़ित भी है और वही उसका विनाशक भी है।
             वर्तमान करोना संकट में मानव जाति को अनेक परेशानियों से गुजरना पड़ा इनमें ऑक्सिजन की कमी सबसे महत्वपूर्ण है। कई लोंगो ने ऑक्सिजन की कमी के कारण अपने प्रियजनों को खोया है। इस दौरान मनुष्य पर्यावरण संरक्षण के महत्व के प्रति सजग हुआ है। पर्यावरण संरक्षण में मानव की जीवनशैली की महत्वपूर्ण भूमिका है। मानव ने सोश्ल मीडिया और आपसी बातचीत में तो पर्यावरण संरक्षण के प्रति चिंता जताई है किंतु वास्तविक पर्यावरण संरक्षण तो तभी होगा जब मानव अपनी जीवन शैली को बदलेगा।
         आईये कुछ इतिहास में झांके और देखे हमारे पूर्वजों ने कैसी जीवन शैली अपनाई जिससे  वे अनुकूल पर्यावरण देने में सफल हुए। पर्यावरण में वृक्ष और जल का अत्यधिक महत्व है इसलिए  भारतीय संस्कृति में इसे अति उत्तम स्थान दिया गया है। उन्होंने इसे धर्म और जीवन शैली से जोड़ा और वे काफी हद तक सफल भी हुए।
              भारत के पर्यावरण इतिहास को प्राचीन परम्पराओं, लोक जीवन और कलाओं ने समृद्ध किया है। इस संदर्भ में देखा जाए तो भारतीय जीवन शैली में प्रकृति संरक्षण सम्बंधी दिनचर्या शामिल थी, जिसके उदाहरण हमें वेद, उपनिषद् और पुराण में मिलते है। ये ग्रंथ हमें प्रकृति का मूल्य सीखाते है।
भारत में उत्तर तथा दक्षिण की सात नदियो तथा सात पर्वतो को भारतवासी अतीत काल से ही सम्मान देते आये है। भारत का हिन्दू प्रातः स्नान करते समय निम्नलिखित श्लोक पढ़ते हुए देश की नदियो व पर्वतो को सम्मान देता है।
ग्ांगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।                                                                                 नर्मदे सिंधु कावेरी अलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।                                                        महेन्द्रो मलयः सह्म शुक्तिमानऋक्ष पर्वताः।                                                           विंध्यष्च पारियत्रष्च सप्तैते कुल पर्वता।।
अर्थात-
‘‘हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी हमारे इस जल मे वास करो।’’                                                                                       पर्वतो के नाम इसप्रकार है- ‘‘महेन्द्र, मलय, सह्म, शक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य तथा परियात्र।’’
उपर्युक्त सात नदियो तथा पर्वतो के प्रति भारतीयो का सम्मान और निष्ठा इस ष्लोक के माध्यम से प्रकट की जाती है।
सिंधु घाटी के निवासी भी वृक्ष-पूजन करते थे। खुदाई मे अनेक मुहरों पर वृक्षों की आकृतियां अंकित है। पीपल तथा तुलसी की पूजा प्रमुख रुप से होती थी। खुदाई मे एक वनदेवी की मूर्ति भी मिली है जिसमे एक स्त्री के उदर से एक पौधे को निकलते हुए बताया गया है।
सिंधु घाटी के निवासी प्राकृतिक पदार्थो का भी पूजन करते थे। विशाल स्नान-कुण्ड जल पूजा का प्रमाण है। सूर्य और अग्नि-पूजा के प्रमाण मिले है।
मोहन जोदड़ो से एक मुद्रा प्राप्त हुयी है जिस पर पीपल की दो डाली के मध्य एक देवता का चित्र बना हुआ है। हड़प्पा मे भी एक मुद्रा प्राप्त हुयी है जिसमे पीपल की डाली पकड़े एक आकृति दिखाई गई है।
वैदिक कालीन आर्य प्रकृति के उपासक थे। वे प्रकृति के विभिन्न स्वरुपों की पूजा करते थे। उनका विशवास था कि सूर्य, चन्द्र, वायु, मेघ आदि मे ईश्वर का वास है। विद्वान ऐसा मानते हैं कि ‘‘जहॉं कही भी आर्यो को किसी जीवित शक्ति का आभास मिला, वही उन्होने एक देवता की सृष्टी कर दी। अतः अपनी प्रारम्भिक अवस्था मे देवगण प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक मात्र थे।
इतिहास और प्रकृति पूजा
मालवा क्षेत्र मे हर परिवार मे निश्चित वृक्ष की पूजा की जाती है। परिवार जिस वृक्ष की पूजा करता है उसकी लकड़ी जलाता नही है। प्राचीन काल मे वृक्ष लगाने की परम्परा को धर्म से जोड़ा गया है यही कारण हे कि सार्वजनिक स्थलों, जलाशय के तट और धार्मिक स्थानों के आस-पास बड़े-बड़े वृक्ष लगाए जाते थे जिससे पथिक को छाया भी मिले और फल भी मिले।
‘‘वराहमिहिर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत्सहिंता मे एक पूरा अध्याय वृक्षायुर्वेद पर लिखा है जिसमे उन्होने कहा है कि….’’
एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष की दूरी 20 हाथ अथवा प्रायः 30 फिट होना चाहिये जिससे उसकी शाखाए आपस मे टकराए नही और उनको फैलने की जगह मिलें।
बहुभिर्वत किं जातैः पुत्रैर्धर्मार्थवर्जितैः।                                                                 वरमेकः पार्थ तरुयत्र विश्रमते जनः।।
भारतीय संस्कृति मे वृक्षो की महत्ता को स्वीकार करते हुए एक श्लोक मे कहा गया है कि धर्म और अर्थ रहित अनेक पुत्रो की अपेक्षा पथ का एक पेड़ श्रेष्ठ है जहॉं पथिक तो विश्राम कर सके। इसी प्रकार एक अन्य श्लोक मे कहा गया है कि 10 कुओं के बराबर एक बावड़ी, 10 बावड़ीयो के समान एक जलाशय, 10 जलाशयों के बराबर एक पुत्र और 10 पुत्रो के बराबर एक वृक्ष बताया गया है।
दशकूपसमा वापि दषवापि समो हुदः।                                                             दष हदसमः पुत्रो दषपुत्र समो दुमः।।
पेड़ पौधो से संबंधित अनेक पौराणिक परम्पराए भी प्रचलित है जिनमे कथाऐ, गीत, लोक कथाए, व्रत, उत्सव जो वृक्षों के महत्व को रेखांकित करती है।
भारतीय जनमानस मे तुलसी का अत्यंत महत्व है प्रायः सभी घर मे तुलसी का पौधा लगाया जाता है। तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है और नई रिसर्च यह साबित भी कर रही है कि तुलसी का सेवन कैंसर एवं स्वाईन फ्लु जैसे रोगों से लड़ने मे सक्षम है। इसी प्रकार पीपल के वृक्ष में लक्ष्मी का वास माना गया है ,इसलिये पीपल की पूजा की जाती है साथ पीपल के वृक्ष को काटना निषेध है। आज हम सभी ये मानते है कि विज्ञान का दृष्टि से भी पीपल का महत्व अन्य वृक्षों की तुलना मे ज्यादा है।
इसी प्रकार ऑंवला वृक्ष की पूजा ऑंवला नवमी को, वट की पूजा वट सावित्री जैसे व्रत, उपवास और पूजा पौधों को बचाने की दिशा मे अहम प्रयास रहे है।
प्राचीन काल से ही भारतीयो मे पानी के शुद्धिकरण का भी विवरण हमे मिलता है। वराहमिहिर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत्सहिंता मे पानी को शुद्ध करने के लिये औषधियों के उपयोग के बारे मे बताया है। अंजन, भद्रम़ुष्ठ, खस, अमला आदि के द्वारा पानी को शुद्ध करने की विधि वराहमिहिर ने बतायी है। सुश्रुत द्वारा भी मेले पानी को औषधीय पौधो द्वारा शुद करने की विधि बताई है।
प्राचीन भारतीय रीति अनुसार तांबे के बर्तन मे पानी भरकर पीना स्वास्थ के लिये लाभदायक है जिसे की शोधकर्ताओं ने भी वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध किया है।
निष्कर्ष स्वरूप हम कह सकते है कि हमारा इतिहास एवं पूर्व के मानव की जीवन शैली पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग थी। चूकिं मानव के समस्त क्रिया कलाप धर्म से जुडे़ थे अतः उन्होंने प्रकृति संरक्षण को भी धर्म से जोड़ा था। यही कारण है कि जो भी कुछ आज हमारे पास पर्यावरण है, वह मानव के उसी प्रयास का परिणाम है।
वर्तमान में हम धर्म और जीवनमूल्य से दूर होते जा रहे है इसी लिये पर्यावरण खतरे का सामना कर रहें है। यदि सजग होंगे तो हम भी आने वाली पीढ़ी को सही पर्यावरण धरोहर हस्तारन्तरित कर सकेंगे ,जो उनका अधिकार है।