भोग-विलास के जीवन को छोड़े, धर्म साधना का मार्ग अपनाये- आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वजी म.सा.

3:08 pm or July 21, 2022
महावीर अग्रवाल 
मन्दसौर २१ जुलाई ;अभी तक;  ज्ञानीजनों के द्वारा जीवन के  दो मार्ग बताये गये है, सांसारिक मार्ग एवं आध्यात्मिक (संयम) मार्ग। जैन शास्त्रों में भी सांसारिक एवं आध्यात्मिक अर्थात संयम मार्ग की विस्तार से व्याख्या की गइ है। जैन शास्त्रों में बताया गया है कि सांसारिक जीवन बैर के पेड़ एवं उसके फल जैसा है, अर्थात यदि बैर को खाना है तो काटो को तो सहन करना ही पड़ेगा तो दूसरी  और आध्यात्मिक (संयम) मार्ग कल्पवृक्ष के समान है, अर्थात कल्पवृक्ष जैसा सुन्दर जीवन बनाना है तो अध्यात्म को अपनाना पड़ेगा, जिस प्रकार कल्पवृक्ष महान गुणों से युक्त वृक्ष है उसी प्रकार अध्यात्म को अपनाने से हम इस संसार रूपी भव सागर से पार हो सकते है।
                    उक्त उद्गार परम पूज्य जैन आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. आदि ठाणा 8 ने नईआबादी स्थित आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने गुरूवार को कल्पधु्रम शास्त्र की महत्ता का वर्णन करते हुए प्रवचन में कहा कि जिस प्रकार सुक्रत (सूअर) को कई प्रकार के मिष्ठान सामने होने के बावजूद भी मल मूत्र  व गंदगी खाना पसन्द होता है वैसी ही हालत सांसारिक व्यक्तियों की है। सांसारिक व्यक्तियों को झूठे  रिश्ते नातों में ही आनन्द आता है। धर्म व गुरू की शरण मिलने पर भी वह अध्यात्म की ओर अग्रसर नहीं होकर केवल सांसारिक मोह माया में ही उलझा रहता है। ऐसे व्यक्तियों को सांसारिक मोह माया को छोड़ अध्यात्म की ओर अग्रसर जरूर होना चाहिये।
                  भोगों को छोड़-धर्म साधना का मार्ग अपनाये- आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति संयम नहीं ले पा रहा है तो कोई बात नहीं लेकिन उसे भोग विलासतापूर्ण जीवन में उलझने की बजाय धर्मसाधना के मार्ग को जरूर अपनाना चाहिये। प्रतिदिन सामायिक, प्रतिक्रमण, देवपूजा, स्वाध्याय करना ही चाहिये। यदि इतना भी धर्म हम अपना लेते है तो वह भी अध्यात्म की ओर हमारे जीवन को अग्रसर करने जैसा ही है।
अज्ञानी नहीं ज्ञानी बने- आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति जीवन भर सांसारिक झूठे रिश्तेनातों में रहकर अपना जीवन बर्बाद करता है वह अज्ञानी की श्रेणी में ही आयेगा। इसलिये जीवन में ज्ञानी की श्रेणी में आना है तो अपनी आत्मा व मन मस्तिष्क को सांसारिक रिश्तेनातों, भोग विलास में उलझाने की बजाय धर्म साधना का मार्ग अपनाओं। धर्म साधना का मार्ग ही आपको आत्मसुख प्रदान करेगा।
52 धर्म आराधक  कर रहे है सिद्धी तप की तपस्या- आचार्य श्री यशोभद्रसूरिश्वजी म.सा. व आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. की पावन प्रेरणा  से नईआबादी स्थित आराधना भवन श्री संघ के द्वारा 44 दिवसीय सिद्धीतप की तपस्यायें कराई जा रही है यहां 52 तपस्वी जिसमें 40 महिला व 12 पुरूष शामिल है। सिद्धी तप कर रहे है। इस 44 दिवसीय तपस्या में श्रावक श्राविकाये 36 दिवस उपवास रखेंगे। केवल 8 दिवस आहार लेंगे। यह तपस्या 20 जुलाई से प्रारंभ हो गई है जो कि 2 सितम्बर तक चलेगी। सभी तपस्वियों के पारणे की व्यवस्था आराधना भवन श्री संघ के द्वारा की गई है।