मजदूर को मजदूरी नहीं बल्कि कारखानों की कमाई का हिस्सा मिलना चाहिए

5:55 pm or May 1, 2022

महावीर अग्रवाल 

मन्दसौर एक मई ;अभी तक;  मजदूर विश्व अर्थव्यवस्था एवं विकास की रीढ़ है। मजदूरों पर अत्याचार एवं काम के 15 घंटे का विरोध एवं हड़ताल करने के कारण पूंजीपतियो ने शिकागो में 1 मई 1886 को मजदूरों की मांग को स्वीकार कर काम के घंटे 8 किये। इसी दिन इसे विश्व मजदूर दिवस के नाम से जाना जाने लगा। भारत में इसी दिन 1923 में चेन्नई से मजदूर दिवस मनाने  की शुरुआत हुई और वहीं मजदूरों ने नारा दिया ‘‘हम मजदूर है मजबूर नहीं‘‘।

उक्त बात  विश्व मजदूर दिवस के अवसर डॉ अंबेडकर जागृति मंच के संस्थापक एवं पूर्व प्राचार्य पृथ्वीराज परमार ने मजदूर दिवस की प्रातः राजाराम फैक्ट्री के मुख्य द्वार पर मजदूर साथियों का फूल माला पहनाकर एवं गुलाब के पुष्प भेंटकर सम्मान करते हुए कही।

मजदूर भाई यह सम्मान पाकर प्रसन्न हुए और उन्होंने बताया कि फैक्ट्री स्थापना से आज तक किसी ने हमारा सम्मान नहीं किया आज जो सम्मान हुआ इससे अभिभूत है !

इस अवसर पर संयोजक रामलाल लोदवार ने कहा कि विश्व की अर्थव्यवस्था सुव्यवस्थित चलाने के लिए कारखाने और कृषि भूमि की महती आवश्यकता होती है। कारखानों में मुख्य रूप से श्रम और पूंजी की आवश्यकता है विश्व में पूंजी के बराबर मजदूरों का भी योगदान है। श्री लोदवार ने मांग की कि मजदूर को मजदूरी नहीं बल्कि कारखानों की कमाई का हिस्सा मिलना चाहिए।

इस अवसर पर पी.सी. बामनिया , जीवराज डांगी, आर.एन. श्रीमाल एवं  विपिन चरेड सहित अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।