माता सती के 51 शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी

भिण्‍ड से डॉ. रवि शर्मा-

भिंड १२ अक्टूबर ;अभी तक; माता सती के 51 शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी है। माता का यह मंदिर पाकिस्तान में स्थित है। 11वीं शताब्दी में बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-उदल के चचेरे भाई मलखान पर हिंगलाज देवी की कृपा थी। मलखान, हिंगलाज से माता को अपने साथ लेकर आए थे। वीर यौद्धा मलखान, युद्ध में जाने से पहले हिंगलाज देवी की पूजा-अर्चना करते थे। ऐसा कहा जाता है कि माता स्वयं अपने हाथ से मलखान को तलवार दिया करती थीं। इसलिए रणकौशला देवी के नाम से पूजी जाती हैं।

आज में बात कर रहे है भिंड जिले के दबोह कस्बे से दो किलोमीटर दूरी पर स्थित अमाहा गांव के नजदीक मां रणकौशला देवी की। नवदुर्गा उत्सव में मां रणकौशला की पूजा-अर्चना करने के लिए देश विदेश से श्रद्धालु आते है। यह माता का एक ऐसा मंदिर है जहां माता की प्रतिमा सोने जैसी चमकती है। माता के एक हजार साल पुरानी प्रतिमा है। यह मंदिर का निर्माण चंदेल राजाओं द्वारा कराया गया था। मंदिर के पुजारी हलधर पंडित के मुताबिक आल्हा-उदल के चचेरे भाई सामंत वीर मलखान व उनकी पत्नी गजमोतिन माता की परम भक्त थीं। वे दोनों माता को हिंगलाज से लेकर आई थीं।

वीर मलखान का पहूज नदी के किनारे सिरसा गढ़ नामक रियासत हुआ करती थी। पहूज नदी की बीहड़ में आज भी इस रियासत के अभिशेष मिलते है। मंदिर परिसर में एक बावड़ी है स्थानीय लोगों के मुताबिक मंदिर परिसर की बावड़ी का सीधा रास्ता सिरसा गढ़ से जुड़ा है। एक बावड़ी सिरसा गढ़ में भी है। इसी बावड़ी के रास्ते से वीर मलखान अपनी पत्नी गजमोतिन के साथ पूजा-अर्चना के लिए आया करते थे। मलखान और दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान के बीच युद्ध हुआ था। पृथ्वी राज के सेनापति से मलखान के साथ छल किया था। जिससे मलखान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

पत्थर से अष्टधातु का लिया स्वरूप

पंडित हलधर का कहना है कि सन् 1998 में श्रीनगर से कारीगर आए थे। इन कारीगरों कने मां ने दर्शन दिए थे। मां ने कहा था कि मेरा स्वरूप काफी पुराना हो गया है। पाषाण प्रतिमा को अष्टधातु की प्रतिमा में बदलना है। यह प्रेरणा के साथ जब कारीगरों ने मंदिर प्रबंधन को बताया तो पाषाण प्रतिमा को अष्टधातु की परत चढ़ाई गई। इस तरह मां का स्वरूप सोने जैसा दमकने लगा है।

श्रद्धा से पूजा करने पर मां करती हर मनोकामना पूरी

मां रणकौशला देवी को स्थानीय लोग रेहकोला देवी के नाम से भी पूजते है। माता का यह सिद्धदात्री स्वरूप है। वो शत्रु पर विजय दिलाने के साथ ही हर मनोकामना पूरी करती है। सबसे ज्यादा लोग माता से संतान प्राप्त की इच्छा के साथ आते है। मां की कृपा से गोद हरीभरी होने पर पालना चढ़ाने का रिवाज है। इसके अलावा यहां लोगों की मनोकामना पूरी होने पर जवारे, श्रृांग चढ़ाई जाती है। यहां पूजा-अर्चना के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।

मां की कृपा से वीर मलखान के शरीर हो गया था वज्र की तरह कठोर

ऐसी किविदंति है कि जब आल्हा-उदल के भाई सिरसा गढ़ के सामंत वीर मलखान का पृथ्वी राज चौहान से युद्ध हुआ था। उसे पहले मां रणकौशला ने मलखान का शरीर वज्र की तरह कठोर बना दिया था, परंतु माता की नजर पैरों के तले पर नहीं पड़ सकी, इसलिए पैर के पंजे कमजोर रहे। मलखान पर अस्त्र और शस्त्र के प्रहार का कोई असर नहीं होता था। यह बात पृथ्वी राज चौहान को पता चली। इस पर व्यू रचना की गई और जमीन के अंदर श्रृंग (नुकीले हथियार) गढ़वाए गए। जैसे ही मलखान का घोड़ा आया तो वो श्रृंगों से घायल होकर जमीन पर गिर गया। जैसे ही मलखान जमीन पर गिर वैसे ही उनके पैरों में इन नुकीले अस्त्र चुभ गए। इस वजह से वो चलते नुकील अस्त्र उनके पैरों को पंजों को चीर देते थे। इस तरह वीर गति को प्राप्त होना बताया जाता है।

 

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