मौन वाचालता पर विराम है तो चंचलता पर लगाम -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २० नवंबर ;अभी तक; मौन मुनि जीवन का पर्याय है, मुनि अल्प भाषी और सत्य भाषी होते है इसीलिए उनके बोले गये शब्द पावर फुल बन जाते हैं। मौन के मंदिर में बैठकर ही सत्य भगवान से साक्षात्कार होता है। आत्मशक्ति का जागरण, अनुभव और अभिव्यक्ति मौन के द्वारा होती है। मौन वाचालता पर विराम है तो चंचलता पर लगाम। वाचाल व्यक्ति बोलकर अपनी चंचलता को व्यक्त करते हैं, इन दोनों पर मौन ही अंकुश का काम करता है। मन मदोन्मत हाथी की तरह होता है मौन का अंकुश मन को वश में रखता है, जो मौन में जीना जानते हैं वे अपने जीवन को प्रशस्तताओं से भर लेते हैं। मौन मूर्खता का नहीं बुद्धिमता का लक्षण है, बोलने की शक्ति होते हुए भी न बोलना मौन है। जो मन से अशांत होते है वे मौन नहीं कर पाते, मन की शांति मौन में अभिव्यक्त होती है, निरर्थक न बोलकर सार्थक और निर्दोष बोलना भी मौन के भावों को पुष्ट करता है, कम बोलने वाले अपने पुण्य को बढ़ाते है जो अनावश्यक और अनर्गल बोलते रहते हैं उनका पुण्य क्षीण होता है और पाप की वृद्धि होती है।
                     ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- आदमी की भाषा शब्दों में व्यक्त होती है और परमात्मा की भाषा मौन में अभिव्यक्त होती है, मौन परमात्मा की प्यारी भाषा होती है, अधिक बोलना अपनी अज्ञता को व्यक्त करता है, भरा घड़ा छलकता नहीं है आधा भरा घड़ा छलकता रहता है, वैसे ही ज्ञानी कम बोलकर अपनी गंभीरता को साबित करते है। कटु और विद्वेष युक्त भाषण से मौन रहना ज्यादा उपयुक्त होता है। समझदार वह है जो अपनी वाणी को संभालकर रखता है, मुँह रूपी  तिजोरी से कंकर नहीं रत्न निकलने चाहिए। जो रतनों की तरह सोच समझकर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं वे इज्जत व सम्मान को बढ़ा लेते हैं। मौन का प्रत्यक्ष फल कलह का निवारण है, जहां कलह होने की संभावना हो वहां व्यक्ति को मौन का अवलम्बन ले लेना चाहिए इससे पारस्परिक शांति बनी रहती है। शांति का अचूक उपाय मौन है।
                     आचार्य श्री ने कहा- मनीषी और मनस्वी लोग अधिक बोलने में विश्वास नहीं रखते उनका विश्वास कम और काम को बोलने में होता है। बोलना या नहीं बोलना-जहां ऐसा द्वन्द्व उत्पन्न होता हो वहां व्यक्ति को मौन रहना चाहिए। मौन रहना संभव न हो तो सीमित शब्दों का सहारा लिया जा सकता है। सामूहिक जीवन में बोलना जितना आवश्यक है मौन रहना उससे भी अधिक आवश्यक है-जो इस विज्ञान को जानते हैं वे अपनी इज्जत, सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित रख लेते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए-जिस घटना की अभिव्यक्ति से हिंसा को प्रोत्साहन मिलता हो, अथवा किसी का मर्म का उद्घाटन होता है उस प्रसंग में मौन रहना ही श्रेष्ठ है, वहां बोलना समस्या बन जाता है और मौन रहना समाधान। कई बार बोलने वाला कई तरह की उपलझनें पैदा कर देता है, जबकि मौन रहने वाला उत्पन्न उलझन को सुलझा देता है। मौन का आनंद बोलने के आनंद कई गुना अधिक है। बोलने में आक्षेप उत्तेजना, अविवेक और वाचालता झलक रहती है मौन में इन सारी झंझटों से मुक्त रहा जा सकता है। अच्छे साधकों की यही पहचान होती है वे समय पर मौन रहते है और समय पर मुखर होते है। न हर समय मुखर होते है और न हर समय मौन रहते है।

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