यदि सदगुरू का सानिध्य न मिले तो शास्त्र ही गुरू है- आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वजी म.सा.

3:35 pm or July 20, 2022
महावीर अग्रवाल 
मन्दसौर २० जुलाई ;अभी तक;  जिनके जीवन में किसी भी प्रकार का राग, द्वेष नहीं होता है वे निग्रंथी अर्थात सदगुरू कहलाने के योग्य है। मानव को अपने जीवन में किसी भी सदगुरू को अपना गुरू बनाना ही चाहिए। यदि गुरू न मिले तो शास्त्र ही गुरू है यदि सदगुरू का सानिध्य उपलब्ध न हो, तो शास्त्र का सानिध्य होना चाहिये। शास्त्र पढ़ने व उसका नियमित स्वाध्याय करने से परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है।
                 उक्त उद्गार परम पूज्य आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. ने नईआबादी स्थित आराधना भवन में आयोजित धर्म सभा में कहे। आपने बुधवार को यहां आयोजित धर्मसभा में कहा कि विश्व के कोई भी ग्रंथ हो सभी की रचना सदगुरू या महापुरुषों के द्वारा की गई है। यदि गुरू का सानिध्य नहीं मिल पा रहा है तो शास्त्र की शरण में ही जाना चाहिये। शास्त्र ही जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते है। शास्त्र का नियमित स्वाध्याय करने से जीवन में राग द्वेष कम होता है। शास्त्र का नियमित स्वाध्याय करने से जीवन में राग द्वेष कम होता है। शास्त्र भी सद्गुरू की भांति हमारे जीवन की गाठे खोलने का कार्य करता है।
शास्त्र विराया, धर्मालुजनों ने धर्मलाभ लिया-
                 बुधवार को धर्मसभा में कल्पधु्रम व सतुसागर आगम (शास्त्र) का वाचन प्रारंभ किया गया। शास्त्र वाचन के पूर्व दोनों शास्त्र विराने की बोली  लगाई गई जिसका धर्मलाभ कांतिलाल दुग्गड़ परिवार, भेरूलालजी पंचमलालजी नौगांवावाला परिवार, दिनेश सोहनलाल पोरवाल परिवार व मोहनलाल महेन्द्रकुमार चौरड़िया परिवार ने प्राप्त किया।
 52 आराधकों के द्वारा सिद्धी तप की तपस्या प्रारंभ-
आचार्य श्री यशोभद्रसूरिश्वजी म.सा. व आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वजी म.सा. आदि ठाणा 8 की पावन प्रेरणा व निश्रा में आराधना भव श्रीसंघ द्वारा सिद्धी तप की तपस्या प्रारंभ की गई है। यहां 52 श्रावक श्राविकाओं ने यह तप प्रारंभ किया है। जो कि 44 दिन तक चलेगा। इन 52 आराधकों में 12 पुरुष व 40 महिलाएं शामिल है। इस 44 दिवसीय तप में 36 उपवास श्रावक-श्राविकाओं के द्वारा किये जावेंगे। कल यहां आयोजित धर्मसभा में सभी श्रावक-श्राविकाओं ने श्रीफल व अक्षत हाथ में लेकर प्रभुजी की प्रतिमा की परिक्रमा कर सिद्धी तप की तपस्या शुरू की। आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वजी ने सभी 52 आराधकों को क्रियाये कराइ। इसके पूर्व 44 दिन तक अखण्डज्योत जलाने की बोली लगाई गई जिसका धर्मलाभ दिलीप कुमार पारसमल धींग परिवार ने प्राप्त किया। धर्मसभा का संचालन दिलीप रांका ने किया।