राजनीति में धनबल, बाहुबल और अतिवाद से लोकतंत्र को बचाना होगा

3:34 pm or July 28, 2022
(रमेशचन्द्र चन्द्रे)
मन्दसौर २८ जुलाई ;अभी तक;  भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है इसमें चुनाव का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि चुनाव ही लोकतांत्रिक शासन का महत्वपूर्ण आधार है स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान करती है किंतु वर्तमान चुनाव प्रक्रिया एवं राजनीतिक व्यवस्था में धनबल तथा बाहुबल के बिना चुनाव असंभव लगने लगे हैं, आज सियासत की अंधी दौड़ में दागी, अपराधी आगे रहते हैं।
                    वर्तमान की राजनीति मंे धनबल एवं बाहुबल एक बड़ी चुनौती है सभी दल पैसे के बल पर चुनाव जीतना चाहते हैं, राजनैतिक खिलाड़ी सत्ता की दौड़ में इतने व्यस्त हैं कि उनके लिए विकास, जनसेवा और राष्ट्र निर्माण की बात करना व्यर्थ है। सभी पार्टियां जनता को गुमराह करती हैं तथा नोट के बदले में वोट चाहती है।
                     शुरुआती दौर में राजनीति समाज सेवा का एक जरिया थी किंतु कालांतर में इसने एक पेशे का रूप अख्तियार कर लिया है, राजनीति निहित तमाम स्वार्थों के चलते सभी लोग साम दाम दंड भेद के बूते राजनीति में आना चाहते हैं, जनसेवा की भावना गौण हो रही है। सियासत में बढ़ती तिजारत की प्रवृत्ति से यहां पैसे का खेल एक लाइलाज बीमारी बनता जा रहा है हाल ही में अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि राजनीति में धनबल और बाहुबल को रोकने में हम फिसड्डी साबित हुए हैं। धन के बगैर राजनीति में सफलता अपवाद ही है राजनीति में बढ़ते धन बल की प्रवृत्ति आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है चुनाव के दौरान के नेताओं के घरों से और गाड़ियों से करोड़ों रुपए बरामद किए जाते हैं जो हमारे लोकतंत्र की राजनीतिक कार्यप्रणाली में पैसे के खेल की भूमिका को बताता है।
                 राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का यह भी एक पहलू है की एक बार जब एक प्रत्याशी बड़ी मात्रा में अघोषित पैसा चुनाव में लगाता है तो वह जीतने के लिए इसको निवेश की तरह इस्तेमाल करता है और इसी का नतीजा होता है कि चुनाव जीतने के बाद सार्वजनिक धन का बड़े पैमाने पर गबन किया जाता है।
                आज की राजनीति अवसरवादी हो गई है आज पार्टी के नेता रात में किसी अन्य पार्टी का दामन थाम लेते हैं तथा पैसे के लिए लोकतांत्रिक सरकारों को गिरा देते हैं यह चिंता का विषय है अब चुनाव में नेता जनता की सेवा करने के लिए कम, अपने लिए धन दौलत कमाने के लिए ज्यादा आ रहे हैं। कुर्सी मिलने पर नेताओं के वारे न्यारे हो रहे हैं अब धीरे धीरे समूचा परिदृश्य बदल गया है ‘‘मनी और मसल पावर’’ अब सत्ता पर स्वयं काबीज होने लगा है।
                  ऐसा नहीं है कि देश में जनतंत्र को प्रभावित करने वाले बाहुबली एवं धन बलियो को नियंत्रित करने के बारे में सोचा नहीं गया इस हेतु एक से अधिक कमेटियों ने चुनाव सुधार की सिफारिश की किंतु सरकार के स्तर पर कुछ नहीं हो सका अंततः उच्चतम न्यायालय ने नामांकन के साथ प्रत्याशियों के अपराध संपत्ति एवं शिक्षा की जानकारी को अनिवार्य बनाया इससे आम जनता तक उनकी कारगुजारियों की जानकारी तो पहुंचती है किंतु चुनाव आयोग के पास उपयुक्त नियम कानून नहीं  होने से कार्रवाई नहीं हो पाती है, असल में चुनाव आयोग की संरचना को सरकार के आश्रय निकाल कर स्वतंत्र बनाए जाने की जरूरत है जिसमें पदों पर चयन से लेकर निर्वाचन की प्रक्रिया में न्यायपालिका को भी शामिल करने की जरूरत महसूस होने लगी है।
कमजोर होते राजनीतिक दल, भीड़ जुटाने से लेकर संसाधनों तक के लिए धनबली और बाहुबली लोगों पर आश्रित होते जा रहे हैं चुनाव साल दर साल महंगा हो रहा है हालांकि निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन की सीमा निर्धारित है किंतु जब प्रत्याशी निर्वाचन व्यय का लेखा-जोखा निर्वाचन पदाधिकारी के कार्यालय में जमा करता है तो वह जानता है कि वह झूठा विवरण जमा कर रहा है और विवरण गणना करने वाला पदाधिकारी भी जानता है कि विवरण सत्य से परे है।
टिकट प्राप्त करने के लिए धन फिर चुनाव जीतने के लिए धन और फिर अध्यक्ष उपाध्यक्ष बनने के लिए धन इसी प्रकार मंत्री मुख्यमंत्री बनने के लिए और यहां तक कि अपनी ही पार्टियों में पद प्राप्त करने के लिए भी धन के इंतजाम करने पड़ते हैं और इन पदों को प्राप्त करने के बाद फिर धन कमाने की जुगाड़ में राजनेता लगे रहते हैं और फिर विकास कार्य भी इसलिए किये जाते हैं कि उन्हें उनसे धन प्राप्त हो सके और यही कारण है धन की ताकत लोकतंत्र पर हावी हो रही है और चुनी हुई सरकार को भी गिरने-गिराने का खतरा बना रहता है।
खैर जो भी हो लोकतंत्र को बचाए रखना है तो उसे धन-बल, बाहुबल एवं अतिवाद से बचाना होगा अन्यथा भारतीय लोकतंत्र की आत्मा जख्मी होती रहेगी तथा सेवाभावी लोग राजनीति से दूरियां बना लेंगे।
राजनीति अब एक व्यवसाय बन गई है, सभी जीवन मूल्य बिखर गए हैं इसलिए जो पार्टियां अपने आप को संस्कारित, देशभक्त एवं धर्मपरायण कहती है, उन्हें राजनीतिक शुद्धिकरण की दिशा में प्रयास करना पड़ेगा तथा जनता को भी उस में सहयोग करना आवश्यक होगा।