राजसत्ता में बैठे लोग कभी आदर्श नहीं रहे, जिन्होंने त्याग किया, वे ही हमारे आदर्श है ;आरिफ मोहम्मद खान

5:33 pm or January 17, 2023

मयंक शर्मा

खंडवा १७ जनवरी ;अभी तक; स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में तीन दिनी व्याख्यान माला के आरंभ में बीती सोमवार संध्याउ  मे केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने  कहा  कि राजसत्ता में बैठे लोग कभी आदर्श नहीं रहे, जिन्होंने त्याग किया, वे ही हमारे आदर्श है।  व्याख्यानमाला के पहले दिन श्री खान ने भारतीय संस्कृति की विश्वव्यापी स्वीकार्यता को वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, गीता और महाभारत के प्रसंग के साथ रखा। राज्यपाल ने कहा- भारतीय संस्कृति की बुनियाद में भौतिकवाद नहीं है। पूरी दुनिया में जो हाथ की ताकत से स्मृति चिन्ह बनाए जाते हैं, उसकी एक एक्सपायरी डेट होती है।

अपने संबोधन में उन्होने आगे कहाकि दिल्ली जाइए वहां पर पुराना किला है। लोगों का मानना है कि यह पांडवों की राजधानी थी। बाद में कुछ बादशाहों ने उसे अपने रहने के लायक बनाया। लेकिन आज की तारीख में खंडहर है, जिसे पुरातत्व विभाग इस हालत में बनाकर रखना चाहता है कि ऐतिहासिक महत्व के कारण यहां टूरिस्ट आ सकें। पांडवों का बनाया हुआ किला चाहे जितना शानदार रहा हो, उसके बावजूद आज खंडहर हो गया है। जबकि उसी वक्त भगवान कृष्ण ने गीता का संदेश दिया, जो किताब के रूप में हमारे पास है। इसका आज तक एक अक्षर भी नहीं बदला क्योंकि वो मानस से पैदा हुई है।

श्री खान ने कहा कि हाथ और ताकत से पैदा चीज एक निश्चित समय तक ही जिंदा रहती है। जबकि मानस से पैदा हुई चीज के लिए मौत बड़ी मुश्किल है। भारतीय संस्कृति को समझने का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं है। गीता का एक श्लोक है जहां तुम असाधारण प्रतिभा, सुंदरता, शक्ति को देखो जान लो यह मेरे तेज के अंश से पैदा हुई है। हमारी संस्कृति संकीर्णता को पास नहीं आने देती। भारतीय संस्कृति के अनुसार जीवन का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति है। राज सत्ता में बैठे लोग कभी आदर्श नहीं रहे। सत्ता का त्याग करने वाले आदर्श रहे हैं।

राज्यपाल ने कहा दुनिया में पांच बड़ी संस्कृतियां हुई। ईरान में शानो-शौकत, चीन में शासन के प्रति आज्ञाकारिता, तुर्क बहादुरी, रोमन खूबसूरती और भारतीय संस्कृति ज्ञान और प्रज्ञा के संवर्धन के लिए जानी जाती है। फिर हमारा बुरा हाल क्यों हुआ। मेरे इस प्रश्न का उत्तर विवेकानंद के भाषण और स्वामी रंगनाथन के लेखों में मिलता है। जब जो ज्ञान आपने प्राप्त किया, उसे दूसरों को साझा करें। हमने ज्ञान को साझा करना बंद कर दिया तो हमारा पतन शुरू हुआ।

राज्यपाल ने कहा ओंकारेश्वर यहां पास में ही है। हमारी संस्कृति की परिभाषा कैसे आई। केरल का एक नौजवान लड़के को पता चला कि ओंकारेश्वर में कोई गुरु हैं। उनसे ज्ञान लेने के लिए वे ओंकारेश्वर तक पहुंच जाते हैं। गुरु से भेंट भी हो जाती है और वे गुरु से ही गुरु का पता पूछ रहे हैं। गुरु ने पूछा तुम हो कौन, यह तो बताओ? शंकराचार्य ने जवाब दिया कि न मैं मन हूं, न बुद्धि हूं, न आंख हूं, न नाक हूं, चिदानंद रूपा शिवोहम्.. शिवोहम्। किसी नाम से भी उसकी इबादत करो, उस एक केशव के पास पहुंच जाएगी। भारतीय संस्कृति में नाम का झगड़ा नहीं है।

राज्यपाल ने कहा स्वामी विवेकानंद के सहपाठी रहे मैसूर विवि के कुलपति बृजेंद्रनाथ सिंह ने अपनी किताब में लिखा है भारत पुरातन है, प्राचीन है लेकिन वृद्ध नहीं है। नए जमाने की मांग के अनुरूप हम आगे बढ़े। इसकी नई नस्ल की जिम्मेदारी है। जगत का मतलब है जिसमें गति हो। स्वामी जी ने कहा सेवा और त्याग से भारत को घनीभूत कर दो। बाकी चीजें खुद ब खुद ठीक हो जाएगी।

ृृ                        कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ.एनएस उबेजा ने की। आयेाजन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिलीप जैन है।कार्यक्रम का संचालन भूपेंद्रसिंह चैहान एवं आभार निशीथ जैन ने माना। डॉ.जीएस त्रिवेदी, महेंद्र शुक्ला सहित राजनीतिक और शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।