रात्रि भोजन का त्याग तन-मन-आत्मा के लिये उपयोगी है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ८ सितम्बर ;अभी तक;  प्रकृति के साथ जीने वाला इंसान कभी दुःखी नहीं होता, दुःखी वह होता है जो प्रकृति से हटकर विकृति में चला जाता है, सुख पाने व सुखी रहने के लिये इंसान को प्राकृतिक बनना पड़ेगा। इंसान के शरीर की प्रक्रिया प्राकृतिक वातावरण के अनुसार चलती है, ज्योहिं सूर्योदय होता है त्योहिं स्फूर्ति का संचार व कोशिकाएँ जागृत होने लगी है। सूर्योदय के समय हर व्यक्ति का मन, मूड़, मानसिकता और मनोरथ अच्छे होते है। यही कारण है सूर्योदय का स्वागत सुबह जल्दी उठकर करना चाहिए। सूर्योदय के चार-पांच घंटे बाद उठने वाले आलस्य के कारण बिस्तर में पड़े जरूर रहते है मगर तन की स्फूर्ति, मन की ताजगी और भावनाओं की पवित्रता से  वचित रह जाते है। सूर्योदय के साथ ही नेचुरल शारीरिक प्रक्रियाएं चालू हो जाती है। सूर्योदय होते ही पंछी पंख फड़फड़ाकर उड़ने लगते है और अपने पेट की चिंता दूर करने के लिये निकल पड़ते है।  सूर्योदय प्रकाश लेकर आता है, प्रकाश ही जीवन है, जीवन में प्रकाश ही रहना चाहिए।
                 ये विचार मंगलवार को शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित प्रसिद्ध जैनाचार्य पूज्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित मंगल सन्देश में कहे। आपने कहा-सूर्योदय और सूर्यास्त की बेला ये दिन और रात की प्रतीक है, सूर्योदय स्फूर्ति और श्रम का परिचायक है, सूर्यास्त होने के बाद हमारे शरीर की कोशिकाएं शांत हो जाती है, जठराग्नि मंद हो जाती है, यह प्रक्रिया इस बात की परिचायक है-इंसान दिन में खाकर ही अपना जीवन आराम से चला सकता है। दिन में खाना प्रकृति है रात में खाना विकृति और देर रात तक खाते रहना महाविकृति है। रात्रि भोजन अनेक विकृतियों और बिमारियों को जन्म देता है। पहले हमारे आर्य परिवारों में कभी रात्रि भोजन नहीं हुआ करता था, आर्य पुरूष दिवाभोजी होकर अपने पवित्र जीवन का निर्माण करते थे। भोजन की पवित्रता और सात्विकता जितनी दिन के भोजन में होती है उतनी रात्रि के भोजन में नहीं। जठराग्नि के मंद हो जाने के बाद अच्छे से अच्छा भोजन भी अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करने वाला बनता है। अंधेरे में क्षुद्रजीवों की उत्पत्ति अधिक होने के कारण रात्रि भोज करना या करवाना घोर हिंसा है।
                आचार्य श्री ने कहा-कुछ लोंग यह तर्क देते है कि यदि प्रकाश में ही भोजन करना हो तो रात्रि में ट्यूब लाइट-मर्करी लाइट का बहुत अच्छा प्रकाश होता है तब क्या आपत्ति है, यह ठीक है रात में कृत्रिम प्रकाश हो सकता है मगर सूर्य का जो स्वाभाविक प्रकाश होना चाहिए वो रात्रि. में नहीं होता, दिन में भोजन करके जिस हिंसा से बच सकते हैं वो रात्रि में नहीं। सूर्य के ताप में वह शक्ति है जो सूक्ष्म जन्तुओं को नष्ट करती है और नजर न आने वाले जीवों की उत्पत्ति को रोकती है। इसके विपरित रात्रि में बिजली के प्रकाश में मच्छर, कीट पतंगों की उत्पत्ति भी ज्यादा होती है, जो भोजन में गिरते हैं और बिमारियों को पैदा करते है। श्री कृष्ण ने युुधिष्ठिर को नरक में जाने के चारा कारणों में एक कारण रात्रि भोजन कहा है, जो रात्रि भोजन का त्याग करता है उसे महिने में 15 दिन के उपवास का लाभ मिलता है। जैनागमों में रात्रि भोजन का निषेध किया है जो स्वास्थ्य के साथ आत्मिक स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है। स्वस्थ शरीर  में ही स्वस्थ मन और आत्मा का निवास रहता है। कोरोना महामारी के इस संकटकाल में हर इंसान को प्रकृति और विकृति के अंतर को समझना चाहिए विकृति से बचना और प्रकृति से जुड़ना यही धर्म का प्राथमिक लक्षण है जो विकृतियों से बचता है वह धार्मिक कहलाता है।

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