राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य के संबंध में केंद्रीय मंत्री श्री तोमर ने मुख्यमंत्री श्री चैहान से की मुलाकात

महावीर अग्रवाल
मुरैना, 26 जून ;अभी तक; राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य के संबंध में केंद्रीय मंत्री एवं मुरैना-श्योपुर के सांसद श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भोपाल प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान से विस्तृत चर्चा की।श्री तोमर ने इस अभ्यारण्य के संरक्षण, स्थानीय निवासियों की आजीविका एवं रेत आपूर्ति हेतु प्रस्तावित व्यवस्था के संबंध में एक प्रतिवेदन के साथ अपना पत्र भी मुख्यमंत्री को दिया और इस संबंध में उनसे आवश्यक कार्यवाही करने का आग्रह किया, ताकि चंबल क्षेत्र के नागरिकों को इसका सीधा लाभ मिल सकें।
           राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान की सीमा पर स्थित सबसे अधिक लम्बाई एवं स्वच्छ पानी का सर्वोत्तम एवं अद्वितीय संरक्षित क्षेत्र है।यह अभ्यारण्य चंबल नदी में राजस्थान के जवाहर सागर बांध से कोटा बैराज तक तथा उसके पश्चात्18 कि.मी. स्वतंत्र क्षेत्र के बाद पुनः केसोरायपाटन से उत्तरप्रदेश के पचनदा तक स्थित है। इसमें चंबल नदी की प्रमुख सहायक पार्वती नदी का बड़ौदिया बिन्दी से पाली तक लगभग 60 कि.मी. भाग सम्मिलित है।अभ्यारण्य क्षेत्र अन्तर्गत पाए जाने वाले जलीय वन्यजीव में घडियालऔर अन्य शामिल है।
             मुख्यमंत्री से चर्चा के दौरान श्री तोमर ने बताया कि इस अभ्यारण्यके संरक्षित क्षेत्र के विभिन्न उत्पादों पर,चारलाख से ज्यादा की स्थानीय आबादी प्रत्यक्ष रूप से निर्भर करती है। अभ्यारण्य में पाए जाने वाले जीवों के रहवास हेतु नदी किनारे उपलब्ध रेत अतिमहत्वपूर्ण घटक है।ऐसे में अवैध रेतउत्खनन पर नियंत्रण भी आवश्यक है, साथ ही स्थानीय निवासियों की आजीविका भी महत्वपूर्ण पहलू है।
            श्री तोमर ने श्री चैहान को बताया कि इस क्षेत्र में बेहतर अवसर उपलब्ध है।जैसे- एक ही संरक्षित क्षेत्र में सभी प्रमुख नम भूमि जीव जैसे घडियाल, मगर, गैजेटिक डॉल्फिन, स्वच्छ पानी के ऑटर एवं 200 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों का संरक्षण। म.प्र. में रामसर साइट घोषित करने के लिए सभी आवश्यक मापदण्डों को पूरा करने वाला प्रदूषण रहित नदीय स्वच्छ जल के नम क्षेत्र का संरक्षित क्षेत्र।साथ ही, ऐसा संरक्षित क्षेत्र, जिसके माध्यम से यह प्रदर्शित किया जा सकता हैकि सही मायने में देश में संरक्षण के उद्देश्यों को पूरा कर दिखाने की क्षमता है और ऐसा राष्ट्रीय अभ्यारण्य भी, जहां म.प्र., राजस्थान एवं उ.प्र. सभी स्तरों पर उचित समन्वय से जैव विविधता के संरक्षण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।
पूर्व में, म.प्र. शासन केवन विभाग ने अभ्यारण्य के संरक्षण एवं स्थानीय लोगों की आजीविका हेतु रेत आपूर्ति के संबंध में प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर एक समिति बनाई थी, जिसके द्वारा आठ स्थलों (जलालपुरा, दलारना, बरोठा, बटेश्वरा, बरवासिन, पिपरई, उसैद-ऊपरी धार एवं रानीपुरा)की पहचान कर इन्हें डिनोटिफाइड करने की सिफारिश की गई थी। ऐसा किए जाने से रेत खनन व्यवस्थित हो सकेगा, साथ ही राज्य शासन को राजस्व का भी काफी फायदा होगा। वर्तमान में बढ़ते अधोसंरचनात्मक विकास कार्यों एवं स्थानीय लोगों की निस्तारी आवश्यकता की पूर्ति के लिए रेत की पर्याप्त उपलब्धता भी हो सकेगी।
             चयनित सभी आठ स्थल अभ्यारण्य क्षेत्र में लगभग 15 कि.मी. की लम्बाई में विस्तारित हैं। इन प्रस्तावित स्थलों में से किसी पर भी घड़ियाल एवं इण्डियन स्कीमर की नेस्टिंग साइट्स नहीं हैं, अतःइन सभी स्थलों को खसरों में विभाजित किया जाकर उक्त समस्त खसरों को अभ्यारण्य क्षेत्र से डिनोटिफाइड किए जाने की कार्यवाही किया जाना प्रस्तावित है। इस संबंध में अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, ग्वालियर ने भी एक पत्र सहित प्रस्ताव भेजा था।
              बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने श्री तोमर से इस पूरे मामले की गंभीरता व महत्ता को समझते हुए प्रतिवेदन पर शीघ्र ही संबंधित अधिकारियों से विस्तृत चर्चा कर समुचित कार्यवाही करने की बात कही है।