लालसाआंें पर संयम किये बिना सुखी नहीं हुआ जा सकता -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ५ नवंबर ;अभी तक; लालसा मानव मन के भीतर पैदा होती है और यह इतनी विस्तृत हो जाती है-द्रोपदी के चीर की भांति उसका अंत ही नहीं आता, आसमान जैसे अनंत होता है, वैसे ही मानव मन में उत्पन्न होने वाली लालसाएँ भी अनंत होती है। लालसा से ही संग्रह का भाव बढ़ता है और संग्रह से शोषण की प्रवृत्ति को बल मिलता है। शोषण की प्रवृत्ति से जुड़ा व्यक्ति अनेक अनर्थों को रच डालता है। शोषण कल भी बुरा था, आज भी बुरा है और कल भी बुरा होगा, लालसा ही व्यक्ति को शोषण का रास्ता दिखाती है। आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है लालसाओं की पूर्ति एक जन्म तो क्या हजारों लाखों जन्मों में भी नहीं हो सकती। लालसा का बंधन ही व्यक्ति को आसक्ति के घेरे में आबद्ध करता है। जिन व्यक्तियों ने जितनी लालसाएँ त्याग दी वे उतने ही सम्पन्न और सुखी बने है। दुःख अभाव का नहीं होता दुःख लालसा पूर्ति न होने का होता है। धूप मे खड़े रहकर पसीना नहीं सुखाया जा सकता वैसे लालसा की धूप में सुख प्राप्त करना संभव नहीं है।
                ये विचार शास्त्री नगर में स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा-ज्यों ज्यों मानव की लालसाएँ बढ़ती है उसके जीवन की गतिविधियां असंयत और लोलुप बनती जाती है, लालसा की आग में जितना डालो उतना स्वाहा होता जाता है, यह आग एक मात्र संयम के पानी से ही बुझती है। संयम से संतुष्टि और संतुष्टी से शांति मिलती है। लालसा समस्या है तो संतुष्टि समाधान है। व्यक्ति की लालसा अर्थ और पदार्थ के अभाव में ही उत्पन्न नहीं होती ये अर्थ और पदार्थ की सम्पन्नता में भी होती है। अर्थ और पदार्थ की विपुलता में लालसाओं की विपुलता भी दिखाई देती है। गरीब जितने लालसा के रोग से रूग्ण नहीं होते उतने अमीर होते है, अमीरों की चाहत बड़ी होती है। लाखों-करोड़ों की सम्पदा का स्वामित्व पा लेने के बाद भी व्यक्ति की लालसा शांत नहीं होती।
                 आचार्य श्री ने कहा-अत्यधिक लालसा रखने वाले व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का मूल्य भी नहीं समझते न वे कानून की मर्यादा को स्वीकार करते है। लालसा की ऐसी विकृति है जो पारिवारिक जिम्मेदारी, सामाजिक मर्यादा और धार्मिक अनुशासन की सीमा का उल्लंघन कर देती है। थोड़े से लाभ के चक्कर में लालची बनकर व्यक्ति अपनी पीढ़ियों की संचित प्रतिष्ठा को खो देता है। सुख, सम्पत्ति, साधन-सुविधाओं की अन्तहीन लालसाओं में उलझकर व्यक्ति अपने वर्तमान के आराम को भी विराम लगा देता है। ये लालसाएं कभी किसी की न पूरी हुई है न होगी बल्कि एक लालसा दूसरी लालसा को पैदा करने वाली बन जाती है। लालसा के वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है, इसकी न कोई दवा है न कोई उपचार। व्यक्ति का विवेक जागृत हो जाए और वह यह सोचें कि मैं क्या लाया था और यहां से जाते वक्त क्या लेके जाऊंगा। इस सात्विक चिंतन से ही लालसाओं पर ब्रेक लग सकता है। यह ब्रेक ही संतुष्टि और समाधि का भाव पैदा करता है। जो प्राप्त में संतुष्ट है वह लालसाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है। ये भाव सभी के भीतर में जागृत होने चाहिए।

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