लुप्त होती कला और परंपरा…….संझा तू थारे घर जा .. . . थारी बई मारेगा…कुटेगा ….डेरी में ड़चोकेगा

10:05 pm or September 17, 2020
लुप्त होती कला और परंपरा.......संझा तू थारे घर जा .. . . थारी बई मारेगा...कुटेगा ....डेरी में ड़चोकेगा .
मन्दसौर १७ सितम्बर ;अभी तक; लुप्त होती कला और परंपरा…….संझा तू थारे घर जा .. . . थारी बई मारेगा…कुटेगा ….डेरी में ड़चोकेगा …..और वास्तव में संझा अपने घर चली गई। 😊😊 संझा को देखकर अपना बचपन याद आ जाता है।
                उक्त बात कह रहे समाजसेवी श्री विनोद मेहता। उन्होंने इस प्राचीन पारम्परिक गीत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संजा गीत बाल कविताएं हैं । इनके अर्थ और भाव के बजाय अटपटे ध्वनि प्रधान शब्द और गाने वालों की मस्ती भरी सपाट शैली आकर्षित करती है ।  कुछ गीतों को बरसों-बरस से दोहराने से शब्द घिस कर नये रूप पा गए – कहीं अर्थहीन हैं या अन्य अर्थ देते हैं किन्तु बच्चों को इस सबसे क्या ?
उनका उत्सव तो गोबर से बनाएं भित्ति चित्रों की रचनात्मकता , गीतों की अल्हड़ – अलबेली ध्वनियों से है ।
तालियों और कन्या-कंठों से संध्या समय नये कलरव से भर जाता है ।
बच्चे हर घर जा जा कर इन गीतों को दोहराते हैं और संजा माता का प्रसाद हर घर ,हर दिन नया ..बड़े गोपनीय ढंग से प्रसाद पर कपड़ा ढक कर लायेगी बिटिया और पूछेगी – ताड़ो ?
मतलब,  बताओ इसमें क्या है ?
सब हिला – डुला कर देखेंगे ,सूंघेंगे , यदि फिर भी न बता पाये तो लाइफ लाइन – कौन सी परी ?
मीठी परी , चरकी परी , खट्टी परी ????
बड़ा हो हुल्लड़  श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन चलता है ।
शाम ढलते ही गोबर लाओ , दीवार लीपो , कोट -कंगूरे , पालकी , पलना , सीढ़ी , चांद-सूरज, फूल-पत्ते, घोड़ा – बारात ,गनपति .. जाने कितने तरह के चित्र रोज हर घर की बाहरी दीवार पर बनते हैं । इन चित्रों को गुलबास , कनेर , गुड़हल के फूलों से सजाती हैं बालिकाएं । कभी चमकीले , रंगीन कागजों से भी । किसकी संजा सुन्दर हो ,यह होड़ भी है ।
हर घर के आंगन में अनौपचारिक उत्सव के मजे लेते बच्चे ..संजा का असली सौंदर्य है ।संजा के  आखरी दिन  ग्यारस कोट बनाया जाता है एवं अमावस के अगले दिन पडवा को नदी में विसर्जित किया जाता है।फोटो मानस्वी गोस्वामी बोरदा  से लिया गया।

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