लोभी कभी सही व गलत का निर्णय नहीं कर सकता -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ३१ अक्टूबर ;अभी तक; यदि संसार की समस्त बुराईयांे के समुद्र का मंथन किया जाए तो उससे प्राप्त सारांश का नाम हमें लोभ ही रखना होगा, लोभ एक ऐसी अंतहीन भूख है जो कभी शांत नहीं होती वरन् शांत करने के प्रयत्न से दुगुनी-चौगुनी बढ़ती जाती है। धन का लोभी चाहे जितना हासिल करता जाए उसकी लिप्सा अछोर बनी रहती है। सत्ता लोलुप सत्ता के बड़े से बड़े रूप से भी तृप्त नहीं होता। लोभ हकीकत में एक ऐसी सदा सुहागन क्षुधा है जिसकी भट्टी में लगातार झोंकते जाइये कोई नतीजा नहीं निकलेगा, लगता तो यह रहेगा कि हर बार कि यह अंत आया, यह किनारा आया किंतु अभी ओर, और अभी ओर की लपटें उठती रहेंगी, लोभ का कभी अंत नहीं है, आदमी की आयु का अन्त आ जाता है मगर इसका अंत नहीं आता।
                   ये विचार शास्त्री नगर में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘लोभ कितना आवश्यक’ विषयक परिचर्चा में कहे। आपने कहा लोभ व लिप्सा भाई बहन है, लोभ वृत्ति है लिप्सा प्रवृत्ति है। लिप्सा बटोरने की मदान्ध कामना है, सब कुछ बटोरने की अंधी दौड़ लिप्सा में व्यक्ति झूठे परितोष से बंधा रहता है। लोभ और लिप्सा में ‘अभी ओर’ के सिवाय कुछ सूझता नहीं। कोठे भरे है अनाज के, बैंक में बेहिसाब बेलेन्स है, पेटियों में अनगिनत पौशाखें है किसे पहनूं किसे छोडूं यह उलझन बनी रहती है फिर भी अभी ओर चाहिए का अंत ही नहीं आता है। यह लोभी की मानसिकता है वह तन की परवाह किये बगैर अपनी भूख को बुझाना चाहता है मगर वह बुझती नहीं, लोभ पिता है-बुराईयों का, खजाना है विकृतियों का, मुनीम है कष्टों व संकटों का, दलाल है बीमारियों का। इसने सारे जहां में अपना राज किया है।
                   आचार्य श्री ने कहा-लोभ के कारण ही व्यक्ति के सामने सही गलत के निर्णय का कोई भी पैमाना नहीं रहता वह हर आकांक्षा को सही साबित करने की चेष्टा में लगा रहता है जिसकी आज कोई आवश्यकता नहीं है उसे भी अपना लेना चाहता है। लोभ का भूत व्यक्ति के दिमाग को विकृत कर देता है इस विकृति के कारण विवेक विकल हो जाता है। यह सत्य है क्षोभ जितना प्रबल होता है क्रोध, मान, माया की जड़े उतनी ही गहरी होती है। लोभ की तासीर ही यह होती है उसकी पूर्ति में अहंकार बढ़ता है, उसकी पूर्ति न होने पर आवेश आता है और उसकी पूर्ति करने के लिये सारे छल कपट करने पड़ते है। लोभी का मन कभी शांत नहीं रहता उसका तन कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता। भाग दौड़, उठा पटक, आपाधापी में लगे रहना एक लोभी की नियति होती है। असंतोष का बुखार उसे बना ही रहता है वह कभी उतरता नहीं, बुढ़ापे के आ जाने के बाद भी लोभी का मन चक्कर काटता रहता है। लोभ को एक मात्र संतोष से जीता जा सकता है। संतोष जिसके जीवन में आ जाता है वह प्राप्त हो पर्याप्त मानता है। अप्राप्त की वितृष्णा उसे नहीं सताती, उसे जीने का सुख मिलता है, संतोषी बनो लोभ न आज आवश्यक हे न कल होगा इस सत्य को सुने-समझें।

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