लड़का हो या लड़की-सभी अपनी पुण्य सम्पदा साथ लेकर आती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ६ सितम्बर ;अभी तक;  मनुष्य जन्म की प्राप्ति अत्यंत दुलर्भ है, यह सभी धर्म-ग्रंथ व गुरूजन कहते है, इस जन्म को पाने की लालसा सभी जीवों में पाई जाती है, मगर मानव ही मानव का विरोधी बनकर गर्भपात का महापाप कर गुजरता है। मात्र लड़के की लालसा रखकर हमारी कई माताएं इस पाप को करने में जरा भी संकोच नहीं करती। लड़का हो या लड़की सभी अपनी पुण्य सम्पदा साथ में लेकर आती है। उनके जन्म से पूर्व ही उन्हें खतम करवा देना संवेदनहीनता व स्नेहहीनता का परिचायक है। मानवताधारी मानव कभी ऐसा महापाप नहीं करते। यह महापाप आर्य पुरूषों के माथे का कलंक होता है। जो जीव जन्म लेने के लिए आ रहा था उसे बीच में ही मरवा देना घोर अनर्थ का कारण है। हिंसा कभी सुखदायी नहीं होती है यह प्रतिहिंसा को पैदा करती हैं दुःख, द्वन्द, द्रारिद्रयता और दुर्मन्यस्या का कारण हिंसा ही होती है। इससे बचना और बचाना हर मानव का पुनीत कर्तव्य व दायित्व बनता है।
                ये विचार 6 सितम्बर, रविवार को शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य पूज्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित मंगल सन्देश में कहे। आपने कहा-एक तरफ देश के राजनेता बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं, बेटी आगे बढ़ाओं का नारा देते है वे भ्रूण-परीक्षण पर क्यों नहीं रोकथाम लगाते ? भू्रण परीक्षण से ही तो पता लगता है कि गर्भ में बेटा है या बेटी, जब परीक्षण ही नहीं होगा तब पता कैसे लगेगा और ये हिंसा का पाप कैसे होगा? हमारे भारतीय संस्कृति के संस्कार है। चींटी को आटा खिलाया जाता है, मछलियों को आटे की गोलियां जल में डाली जाती है, पशुओं को चारा और पंछियांे का दाने की व्यवस्था की जाती है, इसी तरह ब्याही हुई कुतियाँ को हलवा खिलाने की प्रथा व परम्परा रही है, घायल व असहाय पशुओं को पांजरा पोल में रखा जाता है उसी संस्कृति को मानने वाले हमारे माता-पिता कोमल किस लय की अवस्था प्राप्त बेटी पर खंजर चलवा देते है। माँ साक्षात् दया की देवी अपने ही बालक की हत्यारिनी बन जाती है। आज की माताओं को सोचना चाहिए वे भी तो किसी की बेटी रही है, अगर उनकी माता ने मरवा दिया होता तो वे आज माँ बनने का सौभाग्य कहाँ से पाती, कहते है- आज के भारत मे ंप्रति वर्ष छप्पन लाख बच्चों का गर्भावस्था में ही कत्ल कर दिया जाता है यह कितना बड़ा अधर्म है। घोर दुष्कृत्य है।
              आचार्य श्री ने कहा- जिसको हम पैदा नहीं कर सकते उसे नष्ट करने का हमें कोई अधिकार नहीं है, गर्भपात से बड़ा कोई पाप नहीं, यह राक्षसी वृत्ति है जो आर्य संस्कृति को अपसंस्कृति की ओर धकेल देती है।ं याद रखना चाहिए, दूसरों के दुःख  में भोगा गया सुख कभी आनंददायी नही ंहोता। दुःख देने वाले दुःखी न हो यह कभी संभव नहीं है। सुख देने से सुख की और दुःख देने से दुःख की प्राप्ति यह प्रकृति का नियम है, इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए। अपनी दया, करूणा, अनुकम्पा की भावनाओं को दूसरों के प्रति जागृत रखना चाहिए तो अपनों के प्रति भी। अपने चाहे लड़का हो या लड़की सबको बचाना चाहिए, बचाना धर्म है, मारना अधर्म हैं। अधर्म न स्वयं करें, न दूसरों करवाये, अधर्म को अधर्म मानकर सदैव अपनी मानवता को सुरक्षित रखना चाहिए। यही कोविड महामारी में हर मानव को संकल्प करना चाहिए। संकल्प ये समर्पण और समर्पण से ही सुरक्षा हो सकती है।

 

 

 

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