वक्त की फेक्ट्री में अच्छी-बुरी तकदीरें बनती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ४ नवंबर ;अभी तक; इस संसार में तकदीर बहुत बड़ी शक्ति है। जिसके आगे संसार की प्रत्येक शक्ति झुक जाती है। तकदीर की रेखाओं के सामने हर शक्ति फेल हो जाती है। तकदीर हमारे शुभ-अशुद्ध कर्मों की पुस्तक है। हमारे ही कर्मों की न्याय की कहानी है। प्रत्येक व्यक्ति की तकदीर उसी के हाथों से बनी है। वह दो तरह की है, एक कच्ची पेंसिल से लिखी कहानी जैसी और दूसरी वाटर प्रुफ पेन से लिखी अमिट कहानी जैसी। कच्ची पेंसिल की कहानी इरेजर से मिट सकती है, मगर वाटर प्रुफ वाली नहीं मिटती। इसे जैन दर्शन में निकाचित-अनिकाचित कर्म से संबोधित किया गया। निकाचित कर्म अवश्य भोगे जाते है। उनको भोगे बिना छूटकारा नहीं मिलता, अनाकिचत कर्म को वर्तमान के पुरूषार्थ से परिवर्तित किया जा सकता है। तकदीर भी दोनों तरह की होती है, अच्छा प्रभाव देने वाली तो बुरा प्रभाव देने वाली। हर व्यक्ति को वर्तमान में अच्छा पुरूषार्थ करना चाहिए ताकि अच्छी तकदीर बने, उसे बुरे कार्याें में लगे पुरूषार्थ से विराम लेना चाहिए यही हमारे हित में होता है।
                    ये विचार शास्त्री नगर में स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा-तकदीर फलती है कर्म करने से, मात्र कल्पनाओं की हवाई उड़ान भरने से नहीं, यदि व्यक्ति कल्पनाएं ज्यादा करेगा तो वक्त पर उसे कल्पनाओं का सामना करना पड़ेगा, यथार्थ में उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। जब भूख लगेगी तो वक्त पर भोजन नहीं सिर्फ कल्पनाओं में भोजन दिख जायेगा हकीकत में भोजन नहीं मिलेगा, कल्पनाओं के भोजन से पेट नहीं भरता, तकदीर मात्र कल्पना से नहीं बनती वह बनती है कर्म से। इसके लिये सत्कर्म करें। कल्पना नक्शा है, कर्म मकान का बनता है कोई व्यक्ति केवल नक्शे ही नक्शे बनाता रहे और मकान के लिए कर्म न करें तो उसे मकान की प्राप्ति नहीं होती। इसलिये अच्छी तकदीर बनाने के लिये सत्कर्म करें। जो तकदीर बनाने के लिये वक्त मिलता है उसे व्यर्थ के कार्यों में लगाकर व्यक्ति अपना ही अहित करता है। जो वक्त को नहीं पहचानता वह अनेक उपलब्धियों से वंचित रह जाता  है।
                  आचार्य श्री ने कहा- वक्त की गति को रोकना संभव नहीं है, वक्त पर अपना बदलाव संभव है। जो अपने को बदल देते हैं वे अच्छी तकदीर के स्वामी बन जाते है। खोटी तकदीर को रोना वो रोते है जो वक्त की कीमत का अंकन नहीं करते। जो वक्त हमें आज मिला है उसे सार्थक कार्र्यों में लगाकर अच्छी तकदीर का निर्माण किया जा सकता है। वक्त की फेक्ट्री में ही अच्छी-बुरी तकदीरें बनती है। वर्तमान का सही उपयोग करने वाला बीते बुरे वक्त का पश्चाताप नहीं करता वह उस वक्त से सबक लेकर भविष्य में आशान्वित रहता है। भविष्य अनंत है हर व्यक्ति को उससे आशा रखनी चाहिए। वर्तमान की हर आहट पर वक्त का प्रहार भी लगता है और पहरा भी लगता है जब तक वह अतीत में जाता है तब उस पर मौन का ताला लग जाता है। वर्तमान में जो जीता है वो अपनी अच्छी तकदीर का निर्माण करता है, साधक वर्तमान जीवी होते हैं। इसीलिए वे अतीत से संतुष्ट और अनागत से आशान्वित रहते है।

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