वर्तमान के शुभ संकल्पों के साथ जीने वाला महान भविष्य बनाता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १० नवंबर ;अभी तक; अपने अभ्युदय के लिये समय और अवसर की प्रतीक्षा में मत रहो, प्रतीक्षा-प्रतीक्षा में अभ्युदय के कितने सुनहरे अवसर निकल गये, कितने निकल जायेंगे, इसका कोई आभास नहीं है, हर वर्तमान का क्षण एक विशिष्ट क्षण है, इन्हें विशिष्ट मानकर ही हम श्रेय मार्ग पर आगे बढ़ सकते है, जिस क्षण का व्यक्ति सदुपयोग करता है वह उसके लिये सुअवसर बन जाता है और उसे सफलता दे जाता है। अवसर के सिर पर सफलता नहीं लिखी होती है जो सम्मुख आये अवसर का मूल्य व महत्व समझता है वो लाभ में रहता है, प्रतीक्षा वे करते हैं, जिन्हें समय का महत्व ज्ञात नहीं होता, व्यापारी मण का, भिखारी कण का और साधक क्षण का मूल्यांकन करते हैं। जो व्यक्ति सम्मुख आये अवसर से लाभान्वित न होकर भविष्य के रंगीन सपने देखता है उसके लिये अवसर कभी वर्तमान नहीं बनते है वे भी भविष्य ही बने रहते हैं। वर्तमान में संकल्प के साथ जीने वाला महान भविष्य का निर्माता बन जाता है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा-हर इन्सान के जीवन में कमोबेश ऐसे मंगल अवसर आते ही है जो उसके जीवन को महान बना सकते हैं, उन्हें पहचानने और उनका सदुपयोग करने की समझ रखने वाले विरले ही व्यक्ति होते हैं। हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने वाले निष्क्रिय व्यक्ति के लिये वे सर्वथा निरर्थक प्रमाणित होते हैं। मनुष्य भी कैसा विचित्र स्वभाव वाला होता है-वह गोद वाले से स्नेह न करके पेट वाले से आशा रखता है, हाथ में आये अवसर से आंखे मंूदना और भविष्य के अवसर के लिये दृष्टि गड़ाए रखना समझ में न आने वाली बुद्धिमत्ता है।
                 आचार्य श्री ने कहा- इस जगत में उस व्यक्ति के लिए सुंदर और शुभ अवसरों की कमी नहीं है जो वर्तमान का सम्मान करना जानता है। वर्तमान अतीत बनेगा और भविष्य वर्तमान बनेगा यह प्रकृति का शाश्वत नियम है, जिसने वर्तमान का मूल्यांकन करना और उसे सफल बनाना आ गया उसे अतीत और अनागत का भी मूल्यांकन करना और सफल बनाना आ जाता है। वर्तमान के स्वतंत्र मूल्य को मत भूलो और उसकी कभी उपेक्षा मत करो। उपेक्षा की बुद्धि रखने वाले ही उपेक्षित होते है। वर्तमान समर्थ, स्वस्थ, उदात्त और आनंदमय है तो भविष्य कभी अंधकारमय नहीं हो सकता। भाग्य भी उसको साथ देता है जो वर्तमान में पुरूषार्थ करता है। अर्कण्य व्यक्ति के लिये न वर्तमान सार्थक होता है न भविष्य समुज्जवल। वह हर समय रोता रहता है। उसके रूदन का न कोई अंत आता है न कोई सार्थक रूप निकलता है।
आचार्य श्री ने कहा- एक संतुष्ट मन जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, इसी से मनुष्य इस संसार में आनंद और सुख से जी सकता है। वर्तमान को सुधारे बिना मन की संतुष्टि प्राप्त नहीं होती। वर्तमान जीवी व्यक्ति ही संयमित-नियमित जीवन जीता है। वह बड़ा आनन्दित होता है, अपने जीवन में वह ऐसा कर गुजरता है जो हजारों व्यक्ति नहीं कर पाते। वर्तमान में जीने वाले विचक्षण होते हैं, विचक्षण ही विलक्षण होते हैं वे सदैव आशावान होते हैं, आशावान ही ऊर्जावान और कर्मठ होते है। वर्तमान की कर्मठता ही जीवन को कमनीय और रमणीय बनाती है। इस सच्चाई को हर व्यक्ति समझे यह आवश्यक है।

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