वासना वह आग है जिसमें सब स्वाहा हो जाता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २६ अक्टूबर ;अभी तक; सुख वासना की पूर्ति में नहीं उसके परित्याग में है, वासना पूर्ति जन्म सुख क्षण मात्र में दुःख में बदल जाता है, जबकि सुख वो होता है जो कभी दुःख में न बदलें। जिसका परिणाम दुःखद होता है वह कभी सुख नहीं होता। वासना का वेग दुर्जेय होता है, बड़े-बड़े योग साधक वासना से आक्रांत होकर भोग की भूल भलैया में उलझ जाते हैं, उनके लिये वासना को जीतना कठिन हो जाता है। विजातीय का जब तक सम्पर्क बना रहता है तब तक वासना से मुक्त होना कठिन ही नहीं दुष्कर होता है चाहे लड़के हो या लड़की, दोनों में विजातीय का आकर्षण रहता है, इसी आकर्षण से परस्पर देखना, मिलना, वार्तालाप करना अच्छा लगता है ये सारे वासना के ही छद्म रूप होते है इनमें जब निरंतरता और निकटता बढ़ती जाती है तब वासना विकराल रूप धारण कर लेती है, इस वासना के भँवर जाल में जो एक बार फंस जाता है उसके लिये फिर उससे निकलना कठिन हो जाता है, नारी एक प्रतीक है वास्तव में तो वासना ही राक्षसी वृति होती है। इसके उदय में व्यक्ति अपने सारे सम्बन्धों को विस्तृत कर बैठता है, वासना वह आग है जिसमे ंसब स्वाहा हो जाता है।
                      ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- वासना साधना के लिये ही खतरा नहीं, यह स्वस्थ स्वास्थ्य के लिये भी बहुत बड़ा खतरा है, हर व्यक्ति स्वस्थ और प्रसन्न रहना चाहता है उसके लिये उसे अपनी वासना पर नियंत्रण आना चाहिए। जो वासना का दास होता है वह आधि, व्याधि और उपाधि जन्य दुःखों से घिरा रहता है, उसे कभी पूर्ण समाधि प्राप्त नहीं होती। वासना का दमन नहीं शमन होना चाहिए। समत्व की प्रज्ञा जागने के बाद मन की सारी वासनाएं शमित हो जाती है। शमन का मार्ग ही साधना से प्राप्त होता है। दमित वासनाएं तो अनुकूल परिस्थितियों के उपस्थित होने पर भड़क जाती है। शमित वासनाएँ निर्मूल हो जाती है उनके भड़कने का कोई चान्स नहीं रहता। वासनाओं को निरंकुश कर कोई भी परिवार व समाज अपने उज्जवल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता। वस्तु का त्याग कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं होता त्याग तो वासना का होता है, वस्तु का त्याग किया और वासनाओं का त्याग नहीं किया तो वह केवल दम्म और दिखावा है, दरअसल आज वस्तु त्याग को ज्यादा अहमियत दी जा रही है जबकि वासना का त्याग सबसे ज्यादा कठिन और जटिल हैं, वासनाओं में कमी लाने का सतत प्रयत्न करते रहना ही वास्तविक सुधार और उद्धार है।
                    आचार्य श्री ने कहा-चारित्रिक मूल्यों को महत्व देने से ही वासना का पहलू कमजोर होगा, वासना और वैराग्य दोनों साथ नहीं चलते इनमें छत्तीस का आंक है-वैराग्य के आविर्भूत होते ही वासना पलायन कर जाती है साधक में वैराग्य का भाव दृढ़ होना चाहिए, जिस वयक्ति में ज्ञान परक वैराग्य की भाव धारा बहती है उसमें वासना के भावों में शून्यता आ जाती है। वासना के समाप्त होते ही संसार भर की सब महिलाओं में माँ के दर्शन होने लग जाते है। माँ और बहन का भाव, पिता और भाई का भाव ही वासना को क्षीण करता है, ऐसे में दुष्कर्म की घटनाएं अपने आप समाप्त हो जाती है।

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