विवेक वती बुद्धि ही न्यायपूर्ण व्यवहार करती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १९ सितम्बर ;अभी तक; मनुष्य की यह प्रकृति होती है, वह दूसरों की भूलों एवं अपराधों के लिये दण्ड का विधान  चाहता है तथा अपनी भूलों व अपराधों के लिये क्षमा किये जाने की अपेक्षा रखता है। क्या यह मानव का न्यायपूर्ण व्यवहार होता है, बेशक नहीं। हम अपनी भूलों व अपराधों को भी जिस दिन दंड के योग्य मानेंगे तब अपने प्रति न्याय का व्यवहार करने में समर्थ होंगे। दूसरों के दोष आसानी से नजर आते हैं अपने दोषों की तरफ दृष्टि नहीं जाती। यह एकांगी दृष्टिकोण न्यायपूर्ण व्यवहार में बाधक बनता है, न्याय समान होता है, दूसरों को दंड और अपने को क्षमा यह न्यायोचित व्यवहार नहीं कहलाता। इस प्रक्रिया के चलते पारिवारिक और सामाजिक जीवन में असंतोष पैदा होता है, असंतोष-रोष में परिवर्तित होकर उभयपक्षों को अशांत करता है। इस अशांति का समाधान न्यायपूर्ण व्यवहार में छिपा हुआ है, जैसे दूसरों को दंड दिया जाता है, वैसे ही स्वयं को भी दंड दिया जाना चाहिए। मगर स्वयं को कौन दंडित करें? इस तरह सामाजिक समता और पारिवारिक संगठन छिन्न भिन्न हो जाता है, परिवार का संगठन ही समाज को प्रभावित करता है, समाज और परिवार एक दूसरे के पूरक है। बिना परिवारों के समाज की कोई परिकल्पना ही नहीं की जा सकती। न्यायपूर्ण व्यवहार ही परिवार और समाज के सौहार्द भावों को प्रतिष्ठित करता है।
                              ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन से विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने 19 सितम्बर, शनिवार को प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- आज व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति तो सजग है किन्तु कर्तव्यों के प्रति नहीं, जो मात्र अपने अधिकारों का ध्यान रखता है, कर्तव्य का नहीं, वह कभी दूसरों के प्रति न्याय नहीं कर सकता। जो दूसरों के अधिकारों के प्रति सजग होता है वहीं न्याय पूर्ण व्यवहार करता है तथा अपने कर्तव्य का निर्वाह सम्यक प्रकार से कर पाता है। परिवार वह ईकाई है जहां प्रत्येक सदस्य का कोई न कोई अधिकार होता है, उसको पहचानना और उसकी रक्षा करना अपने कर्तव्य में समाहित है। सबको यथायोग्य सम्मान एवं उनकी समीचीन आवश्यकताओं की पूर्ति हमारे पास उपलब्ध संसाधनों के अनुसार होनी चाहिए। यह परिवार की संगठनात्मक शैली ही सही सामाजिक परिवेश में ढलती है और सामाजिक जीवन को परिपुष्ट करती है।
आचार्य श्री ने कहा-विवेक युक्त बुद्धिवाला व्यक्ति ही अपने दोषों को ठीक से देखने में समर्थ होता है तथा दूसरों को व्यर्थ में दोषी ठहराने की हठधर्मिता नहीं करता। उसे पर दोषों के देखने में रूचि ही नहीं होती, इससे उसको कभी भी मानसिक संक्लेश के दौर से नहीं गुजरना पड़ता। वह अपने रत्तीभर दोष को देखकर उससे मुक्त होनेे के लिये प्रयत्नशील होता है। उसे संसार के स्वरूप का सही दर्शन हो जाता है। उसकी सोच सकारात्मक और व्यवहार सत्कारात्मक हो जाता है। यह बात याद रखनी चाहिए मोहग्रस्त बुद्धि ही भेदभाव या पक्षपात करती है। वह भोगों की ओर आकर्षित करती है, सच्चे ज्ञान पर वह आवरण डालती है, इसके रहते वह दूसरों के दंड को चिंता करता है, जब बुद्धि का नियन्त्रक विवेक का भाव हो जाता है तो बुद्धि निष्पक्ष रीति से सही सही कार्य करने में सक्षम होती है। विवेक वाली बुद्धि ही न्यायपूर्ण व्यवहार करती है और वही पारिवारिक शांति और सामाजिक समता का आदर्श उपस्थित करती है। मोह मनुष्य की बुद्धि को दोषग्रस्त बना देता है फिर बुद्धि निष्पक्ष नहीं रहती। वह विकास की अपेक्षा विनाश में अधिक प्रवृत्त होती है। कोरोना के महामारी के चलते हर व्यक्ति को अपनी बुद्धि की शुद्धि करनी चाहिए। इसी से निष्पक्ष न्यायपूर्ण व्यवहार की आशा पूर्ण की जा सकती है।

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