वेद पुराणों में उल्लेख वाले कल्पवृक्ष के 10 पेड़ है मन्दसौर संसदीय क्षेत्र में

महावीर अग्रवाल
 मन्दसौर १९ सितम्बर ;अभी तक; भारत वर्ष के वेद पुराणों में उल्लेख वाले कल्पवृक्ष का साढ़े चार हजार साल पुराना इतिहास है जब यह वृक्ष वहां मिला था। मंदसौर संसदीय क्षेत्र में 10 कल्प वृक्ष के पेड़ मौजूद है। वैसे मूलतः यह वृक्ष अफ्रीका का है। मुगल इस वृक्ष को भारत मे लाए ऐसा माना जाता है।अफगानिस्तान के खुरास्तन प्रांत में भी यह वृक्ष मिलता है। इसे खुरापानी इमली नाम से भी इसे जाना जाता है। मराठी में इसे गोरख चिंच के नाम से भी जानते है। कल्पवृक्ष के पेड़ में नर व मादा दोनो प्रकार के पेड़ होते है और  ऐसे बहुत कम स्थान है जहां दोनो पेड़ है लेकिन कुचडोद ऐसा स्थान है जहाँ दोनो पेड़ है।
                               पुरवेत्ता श्री कैलाशचंद पांडे का कहना है कि मंदसौर जिले में कल्पवृक्ष के 10 पेड़ है। कुचडोद में 2 पेड़ है जो कोई एक हजार वर्ष पुराना है। सीतामउ के पास ग्राम खेड़ा में 1,मल्हारगढ़ तहसील ,गरोठ, जावद तहसील के ग्राम पलेवना में एक – एक तथा नीमच तहसील में कल्पवृक्ष के 3 पेड़ है। कुचडोद में खड़े इस पेड़ के आसपास चौपाल बन गई है जहां गांव के लोग इस पेड़ के नीचे ही चौपाल लगाते है।
                            पुरवेत्ता श्री पांडे ने कल्पवृक्ष के पेड़ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ग्रामीण इस पेड़ को भगवान की प्रतिमा मानकर इसकी पूजा करते है। इसका पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व बताते हुए कहा कि इसका वेद पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। लोग इसके नीचे बैठकर पूजा करते है। कुचडोद के इस पेड़ का नाम ग्रामीणों ने हजार साल का रुख रखा है। कुचडोद ऐसा स्थान है जहां कल्पवृक्ष के नर व मादा दोनो पेड़ है। ये पेड़ जब भी जिसने भी लगाया उस वक्त उसने दोनो पेड़ लगाए।
श्री पांडे का कहना है कि 100 फीट की ऊँचाई वाले इस पेड़ का तना 40 फीट की मोटाई तक होता है। उर्दू भाषा मे इसे खुरासानी ईमली के नाम से भी जाना जाता है। इस पेड़ के धार्मिक महत्व को बताते हुए कहा कि कुचडोद में ग्रामवासी इस पेड़ के नीचे प्रतिवर्ष गणेश व दुर्गाप्रतिमा की स्थापना करते है। महिलाएं अमावस्या पर इसकी पूजा करती है। इंद्र का रूप होने से यहां के लोग वर्षा के पहले मानसून का आनन्द इस पेड़ पर छाने वाली हरियाली से लगाते है। गर्मी खत्म होने पर इस पेड़ पर फूटने वाली नई कोपलों से एक सप्ताह में मानसून के आगमन का अनुमान लगाते है।
उन्होंने हिन्दू मान्यता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्न निकले थे उनमें से एक कल्पवृक्ष भी था। इसे उस समय इंद्रदेव को सौपा गया था। तब से यह वृक्ष भारत के तटवर्ती इलाको के साथ ही देश के कई हिस्सों में पहुंच गए।
श्री पांडे ने कहा कि एक और हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कल्पवृक्ष के नीचे बैठने से इंसान में सकारात्मक उर्जा के संचार होता है।
पुरवेत्ता श्री पांडे ने बताया कि उन्होंने 86-87 में नीमच के आसपास सर्वेक्षण किया था और यह पेड़ पाय था । वनस्पति विशेषज्ञ श्री रामगोपाल जोशी ने उस समय मांडव व इंदौर के आसपास एक वृक्ष पाया था।
पुरवेत्ता श्री पांडे ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि वन विभाग के पास इस महत्वपूर्ण  वृक्ष की कोई जानकारी नही है। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि ऐसे दिव्य वृक्ष देश मे लगाना चाहिए। देश मे ऐसे वृक्षों के के वृक्षारोपण को बढ़ावा देना चाहिए।

Related Articles

Post your comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *