शब्द को समझकर उपयोग करने वाले शब्द साधक होते हैं -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ५ सितम्बर ;अभी तक;  सृष्टि का विस्तार वाक् शक्ति से होता है, यदि वाक्-वाणी की शक्ति नहीं होती तो एक आदमी किसी दूसरे आदमी के साथ सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता, सम्बन्ध ही सृष्टि का फैलाव करते हैं। वाक् शक्ति के अभाव में न स्मृति होती, न कल्पना होती और चिंतन ही होता। ज्ञान के तीन पहलू हैं-स्मृति, कल्पना और चिंतन ये तीनों वाणी पर अवलम्बित है। इस अर्थ में हम मन और वाणी को अलग नहीं कर सकते, दोनों एक दूसरे के प्रेरक व पूरक है। ऐसी कोई स्मृति या कल्पना नहीं जिसमें वाणी का साथ न हो, वाणी यानि भाषा ही स्मृति, कल्पना व चिंतन को मुखर बनाती है। यूं मन मूक होता है मगर वाणी का अवलम्बन पाकर ही वह मुखर होता है बिना भाषा के मन लंगड़ा है, भाषा के पैरों से ही मन अपनी अभिव्यक्ति की सैर करता है। वाणी-भाषा व शब्दों ने सृष्टि का स्वरूप दर्शन करवाया है, इसीलिए वाक् शक्ति का महत्व अन्य शक्तियों की तरह महत्वपूर्ण है।
                 ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित प्रखर चिंतक जैनाचार्य पूज्य श्री विजयराजजी म.सा. ने 5 सितम्बर, शनिवार को प्रसारित मंगल सन्देश में कहे। आपने कहा-भाषा से प्रसूत शब्द नहीं होते तो धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास और विज्ञान का अस्तित्व नहीं होता, दुनिया का सारा ज्ञान-विज्ञान शब्दों में ही संचित, सुरक्षित और संवर्धित होता है। शब्द ही संसार की समस्त विधाओं-मंत्रों और कलाओं का जनक है। इसीलिए हमारे यहां कहा गया-शब्दैव ब्रह्मः, शब्द को ब्रह्म कहा गया। वाणी का मूल आधार शब्द ही है। इनका अपना स्वभाव है, शब्द सुख भी प्रदान करते है, तो दुःख भी। शब्दों की कुशलता उनके प्रयोग में रही हे। प्रयोक्ता अगर शुभ भावों से भरकर शब्दों का उपयोग करता है तो शब्द सुख उपजाने लग जाते है और अशुभ भावों से शब्दों का उपयोग दुःख पैदा करने वाला हो जाता है। जुबान से निकले शब्द पुनः कभी लोटते नहीं इसीलिए कम से कम शब्दों में मधुरता पूर्ण ढंग से अपनी बात कहना शब्दों का जादूगर ही कर सकता है। शब्द में चमत्कार भरा होता है, शब्द ही भावों को देह देता है और भावना शब्दों के सहारे साकार बनती है। शब्द बड़ी साधना से उठ पाते हैं उन्हें गिराने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, शब्दों की गरिमा समझने वाला ही सोच-समझकर शब्दों का उपयोग करता है।
               आचार्य श्री ने कहा- संयत शब्दों का संयम ढंग से संयत प्रयोग संयत स्वभाव को प्रदर्शित करता है। जिसका स्वभाव असंयत व असहज होता है उसका प्रभाव शब्दों में उतर जाता है, इसी से उसकी और उसके खानदान की पहचान हो जाती है। याद रहना चाहिए- हम शब्दों की तश्तरी में सभ्यता का उत्थान-पतन परोसते है। शब्दों के जरिये मनुष्य अपने विकास और विनाश की यात्रा करता हैं शब्द ही मनुष्य के सभ्य-असभ्य होने की पहचान देते हे। जो शब्दों का सोच समझकर उपयोग करता है वही समझदार कहलाता है। निरूपयोगी और निरर्थक शब्दों का उपयोग अपनी तुच्छ और क्षुद्रता को अभिव्यक्ति करते है। कोविड महामारी के चलते हर व्यक्ति की शब्दों की विकृति से बचना चाहिए। शब्दों की संस्कृति से जुड़ना चाहिए। शब्द साधक वही है जो हित,मित परिमित, शब्दों से काम चलाता है। संतुलित और सत्य से भरे शब्दों का प्रयोग ही शब्द साधना है जो साधक को महान बनाती है।

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