शरद पूर्णिमा टेसू राजा ओर  झेंझी रानी  के विवाह का दिन 

4:51 pm or October 19, 2021
शरद पूर्णिमा टेसू राजा ओर  झेंझी रानी  के विवाह का दिन 
महावीर अग्रवाल 
मन्दसौर १९ अक्टूबर ;अभी तक;  महाभारत काल में यह छोटी सी प्रेम कहानी सिर्फ पांच दिन ही चल पाई, लेकिन इसकी गूंज आज भी गीतों के माध्यम से  सुनाई देती है।
                किवदंती है कि भीम के पौत्र बर्बरीक (टेसू) को महाभारत का युद्ध देखने आते समय झांझी से प्रेम हो गया था। उन्होंने युद्ध से लौटकर झांझी से विवाह करने का वचन दिया था। लेकिन युद्ध मे हारने बालो की ओर से लड़ने के निश्चय ये कारण कौरवों की तरफ से युद्ध करते इसलिए श्रीकृष्ण जी ने लीला रचकर उनसे शीश का दान मांग लिया था।
वरदान के चलते सिर कटने के बाद भी बर्बरीक (टेसू) जीवित रहे। युद्ध के बाद झांझी की मां ने विवाह के लिए मना कर दिया। इस पर बर्बरीक ने जल समाधि ले ली। झांझी उसी नदी किनारे टेर लगाती रही, लेकिन वह लौट कर नहीं आए। तब से टेसू-झांझी के प्रेम की परंपरा आज तक चली जा रही है।
                ब्रज में एक वक्त था जब दशहरे पर रावण दहन से ज्यादा टेसू और झेंझी को घर लाकर उनका विवाह कराने की बच्चों में होड़ ज्यादा रहती थी। बच्चे हाथो में टेसू लेकर घर- घर जाकर टेसू के प्रचलित गीत गाते थे। इसके बाद हर घर उन्हें अनाज या धन देकर विदा करता था। उसे बच्चे टेसू और झेंझी के विवाह में लगाते थे। आखिरी में पूर्णिमा के दिन धूमधाम से उनका विसर्जन किया जाता था। धीरे-धीरे ब्रज की ये अनोखी प्रथा अब गुमनाम होती जा रही है। कुछ ही जगहों पर अब टेसू दिखाई देता है। ग्वाल समाज मे भी टेसू राजा अब पहले की अपेक्षा धूमिल से होते जा है है नई पीढ़ी ओर अपनी छावनी से दूर शहरों मे बसे बासी इसे बस स्मृति मे ही याद रखे हुए है।  पहले हर दुकान पर ये टेसू आसानी से मिल जाया करता था। ब्रज में आज भी कुछ जगहों पर ये प्रथा जिंदा है। शारदीय नवरात्र में बच्चे ‘मेरा टेसू झंई अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा’ ये गीत गाते हैं। लड़के टेसू (इंसान जैसी आकृति वाला खिलौना) लेकर घर-घर घूमते हैं। टेसू के गीत गाकर पैसे भी मांगते हैं। पूर्णिमा के दिन टेसू तथा सांझी का विवाह रचाया जाता है। सांझी और टेसू का खेल ज्यादातर उत्तर भारत में लोकप्रिय हैं। इसे बच्चे ही नहीं, बल्कि युवा भी खेलते हैं। झेंझी बनाते समय लड़कियां जो गीत गाती हैं, वो वहीं की भाषा में होते हैं। आमतौर पर टेसू का स्टैंड बांस का बनाया जाता है। इसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट कर दी जाती हैं, जो क्रमश: टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती हैं या टेसू राजा और दो दासियां होती हैं। बीच में  दिया रखने की जगह बनाई जाती है।
               टेसू खेलने की प्रथा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसी वजह से इसे खेलते समय गाए जाने वाले गीत भी किसी को ठीक से याद नहीं हैं। टेसू का खेल दशहरे से शुरू होता है। यूं तो टेसू की धूम सारे उत्तर भारत में रहती है, लेकिन ब्रज, बुंदेलखण्ड और ग्वालियर में टेसू खास तौर पर प्रसिद्ध है। दशहरे के दिन से ही ये गीत गाया जाने लगता है। वो गीत गाते हुए लड़कों की टोलियां गली-मोहल्लों मे हाथ में टेसू लिए घूमती-फिरती हैं।। वैसे टेसू की शुरूआत भारतीय संस्कृति के त्योहार बच्चियो के संझा बनाने ओर संजा के गीतों से हो जाती है ।।
संजा तू थारे घर जा। थारी बई मारेगा, कूटेगा,डेली पे डचकेगा। हिरणा का बड़ा बड़ा दांत,चाँद गयो गुजरात,छोरा छोरी डरपेगा।
टेसू गीत
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‘मेरा टेसू यहीं अड़ा,
खाने को मांगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी,
घर दो बेटा अठन्नी,
अठन्नी अच्छी होती तो ढोलकी बनवाते,
ढोलकी की तान अपने यार को सुनाते,
‘सेलखड़ी भई सेलखड़ी,
नौ सौ डिब्बा रेल खड़ी,
एक डिब्बा आरमपार,
उसमें बैठे मियांसाब,
मियां साब की काली टोपी,
काले हैं कलयान जी,
गौरे हैं गुरयान जी,
कूद पड़े हनुमान जी,
लंका जीते राम जी।’
‘टेसू भैया बड़े कसाई,
आंख फोड़ बंदूक चलाई,
सब बच्चन से भीख मंगाई,
दौनों मर गए लोग लुगाई।’
‘टेसू रे टेसू,
घंटार बजईयो,
दस नगरी दस गांव बसईयो,
बस गये तीतर बस गए मोर,
सड़ी डुकरिया ए लै गए चोर,
चोरन के घर खेती,
खाय डुकरिया मोटी,
मोटी है के दिल्ली गई,
दिल्ली ते दो बिल्ली लाई,
एक बिल्ली कानी,
सब बच्चों की नानी।’
हेमंत सुरा
सचिव
ग्वाला गवली यादव सामाजिक संस्था मन्दसौर मध्यप्रदेश