शराब न केवल जीवन को बल्कि धन, सम्पत्ति को खराब करती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.े

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २५ अक्टूबर ;अभी तक; शराब एक व्यसन है, इससे मनुष्य अपना ज्ञान, विवेक, स्वास्थ्य, सम्पत्ति, संस्कार सब कुछ खो देता है, आधुनिक कहलाने की होड़ में जब शराब पी जाती है या पिलाई जाती है तब तो अच्छा लगता है जब इसका नशा चढ़ता है और उसका परिणाम भुगतने को मिलता है, तब बड़ा खराब लगता है, शराब की बोतल के मादक पानी में मानव की मानवता का पानी उतार दिया है। यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि यह जिस घर में पहुंच जाती है वहां से सुख, शांति, समृद्धि पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकल जाती है। शराब से आज तक किसी का भला नहीं हुआ यह बर्बादियों का रास्ता खोल देने का सीधा सा रास्ता है। अमीरों को देखकर गरीब भी शराब  पीकर श्रम से अर्जित सम्पत्ति का दुरूपयोग करते है, जहां बच्चों को भरपेट खाना नहीं मिलता, औरतों को तन ढंकने के लिये पूरा कपड़ा नहीं मिलता वहां गरीब शराबी शराब पीकर न केवल अपने साथ वरन् वह अपने परिवार के साथ घोर अन्याय करता है। प्रारंभ में व्यक्ति शराब पीता है कालान्तर में वही शराब उसे पीने लगती है, नशा प्रारंभ में मजा है, मध्य में मजबूरी है, अंत में मौत बनकर आता है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘‘ए शराब ! तू कितनो को कर देती है खराब’’ विषय पर अपने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- शराब पीना व पिलाना सभ्यता की पहचान नहीं है, यह असभ्यता का परिचायक है, पढ़े-लिखे लोग अब अपने मानसिक तनावों को कम करने का इसे एक तरीका बतलाते है, तब तरस आती है, यह चिंतन शक्ति को कमजोर और विवेक शक्ति को कुंठित बना देती है। शराब से तन की कांति, मन की शांति, जीवन की कीर्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट होेती है, एक शराबी का बच्चा जब अपने शराबी पिता के सामने अगर शराब पीये तो उसे कितना बुरा लगता है यही सोच अगर शराबी पिता की हो जाए-मैं अपने पुत्रों के सामने कैसे शराब पीता हूॅ तो शायद वह इस बुरी आदत से बच सकता है, पिता की बुरी आदत क्या बच्चों को बुरी नहीं लगती, उन्हें भी बुरी लगती है, इस विश्वास के साथ इस लत से पिंड छुड़ाया जा सकता है। जहां बाप और बेटे सभी एक साथ बैठकर पीते हो वहां सुधार की कोई गुंजाईश नहीं बचती। फिर सामाजिक व पारिवारिक मान्यता जो मिल जाए तो उससे बड़ी खतरनाक और क्या बात होगी ? शादी-पार्टियों में शराब को पीना-पिलाना जब सामाजिक स्तर पर सामूहिक रूप से होता है वहां सर्वनाशी पतन को नहीं रोका जा सकता।
आचार्य श्री ने कहा- चारित्रिक पतन का रास्ता शराब सेवन से ही खुलता है, यह सारे अपराधों का जनक है। कई लोग यह बेतुका तर्क देते है, इसकी आय से लोक कल्याणकारी प्रवृत्तियों का संचालन होता है, यह बिलकुल बेकार की दलील है, जितनी आय शराब से होती है, उससे अधिका व्यय अपराध नियंत्रण में हो जाता है होगा। बड़ी-बड़ी सभ्यताओं के विनाश का कारण यह सुरा और सुंदरी रही है। शराब के साथ सुंदरी का सम्बन्ध जुड़ा रहता है। इससे न केवल आत्मिक वरन् शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक हानि हुई है और हो रही है। इससे बड़ा और क्या अज्ञान होगा। खुद के पैसों से जूतें खाने का घिनोना काम शराबी करते है।

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