शरीर की सुन्दरता पर नहीं आत्मकल्याण पर ध्यान दो- आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी

2:43 pm or July 30, 2022
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ३० जुलाई ;अभी तक;  आजकल की युवा पीढ़ी अपनी शरीर की सुन्दता के प्रति बहुत अधिक सजग है। युवक-युवती अपने शरीर की सुन्दरता के लिये सैलून एवं ब्यूटीपार्लर का सहारा लेने लगे है, सभी को शरीर की सुन्दरता के साथ आत्मकल्याण की भी चिन्ता करनी चाहिये। शरीर की सुन्दरता स्थायी नहीं होती, शरीर नश्वर है। शरीर पर आयु का असर होता ही है इसलिये जीवन में शरीर की नहीं आत्मकल्याण की चिन्ता करो।
                          उक्त उद्गार परम पूज्य जैन आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. ने नईआबादी आराधना भवन स्थित मंदिर हाल में आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने शनिवार को यहां आयोजित धर्मसभा में कहा कि जो लोग अभी युवावस्था में है यदि उनकी आयु बढ़ेगी तो शरीर पर इसका असर दिखेगा। हमें  शरीर की सुन्दरता पर कम अपने आत्मकल्याण की ज्यादा चिन्ता कर नी चाहिये लेकिन हम केवल अपने शरीर को सजाने संवारने पर ही ध्यान देते है अपने आत्मकल्याण के प्रति लापरवाह रहते है। युवावस्था में धर्म की ओर प्रवृत्त नहीं होते है और चिन्तन करते है कि वृद्धावस्था में धर्म की ओर ध्यान देंगे, तप तपस्या करेंगे, मंदिर जायेंगे लेकिन शरीर की स्थिति बेहतर नहीं होने के कारण यह सब संभव नहीं हो पाता है इसलिये युवावस्था में जितना धर्म से जुड़ सको उतना जुड़ जाओं, तपस्या करो। धार्मिक क्रियाओं में भागीदारी करो इससे आत्मकल्याण में अवश्य मदद मिलेगी।
                          आभूषण से शरीर की शोभा बढ़ती है, आत्मा की नहीं- आचार्यश्री ने कहा कि सोने चांदी, हीरे के आभूषण आपकी शरीर की बाह्य सुन्दरता बढ़ा सकते है लेकिन आत्मा की नहीं। जीवन में अपनी बाह्य सुन्दरता बढ़ाने की ओर ध्यान मत दो अपने आत्मकल्याण की चिन्ता करो, इसी में आपका हित है।
                    परिग्रह को छोड़ों, अपरिग्रह को अपनाओं- आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में आवश्यकता से अधिक संग्रह करते है तो वह परिग्रह की श्रेणी में आता है। इसलिये जीवन में अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह करके मत करो) को अपनाओं जो चीजे अपने लिये अनुपयोगी है उन्हें संग्रह करके मत रखो, उसे जरूरतमंदों को बाट दो। जरूरत से ज्यादा कपड़े, बर्तन, घर, दूकान रखना एक तरह का परिग्रह ही है। इसलिये इनका मोह छोड़ों, परमात्मा से नाता जोड़ों
                   द्वेष से अधिक नुकसानदेह है राग (मोह) आचार्यश्री ने कहा कि जैन संतों  ने अपने आगमों में बताया है कि द्वेष से ज्यादा नुकसानदेह राग (मोह) की भावना है। रााग से ही द्वेष का जन्म होता है यदि हमारा किसी के प्रति राग (मोह) नहीं होगा तो उसके प्रति द्वेष भी नहीं होगा। राग ही द्वेष का कारण बनता है। इसलिये जीवन में राग से बचे। यदि राग से बचोगे तो द्वेष की भावना जन्म ही नहीं लेगी। धमसभा में बड़ी संख्या में धर्मालुजन भी उपस्थित थे। धर्मसभा का संचालन दिलीप रांका ने यिका। धर्मसभा में अन्य संत भी पाट पर विराजित थे।