*शिक्षक ने आदिवासी बच्चों को स्मार्ट फोन से कराया रूबरू*

आशुतोष पुरोहित
खरगोन 28 सितंबर ;अभी तक; खरगोन आज भी दुर्गम व दुर्लभ आदिवासी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यहां कई ऐसे गांव है, जहां बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते है। वहीं यहां कि भौतिक खुबसुरती का भी एक अपना मकाम है, जो प्रदेश में सबसे अलग भी है। ऐसा ही एक क्षेत्र बैड़िया से तकरीबन 15 किमी दूर पहाड़ी क्षेत्र में माता फल्या स्थित है। यहां 80 से 90 मकान है और यहां मात्र 2 से 3 स्मार्ट फोन है, वो भी बड़ी मुश्किल से नेटवर्क और डेटा नहीं होने के कारण चला पाते है। मप्र शासन द्वारा कोरोना काल से हमारा घर हमारा विद्यालय संकल्पना के आधार पर पढ़ाई का नया प्रयोग प्रारंभ हुआ। बस यहीं नया प्रयोग माता फल्या के 30 से 40 आदिवासी बच्चों के लिए स्मार्ट फोन से रूबरू होने का अवसर मिला। दरअसल माता फल्या में एक जिम्मेदारी निभाने वाले शिक्षक है, जो न सिर्फ नियमित कक्षाएं लगाता है, बल्कि बच्चों को अन्य गतिविधियों को मोबाईल के माध्यम से रूबरू कराता है। शासन ने तय किया कि शिक्षक ही घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाएं, लेकिन इस शिक्षक ने माता फल्या, जो कि 3 किमी के दायरे में दुर्गम नालों व पहाड़ियों में बसा है, किसी उचित स्थान पर मंदिर के पास 15 से 20 बच्चों को एकत्रित कर 6 जुलाई से सतत् पढ़ाने का सिलसिला जारी रखे हुए है।
*अक्षरों, पशु-पक्षियों व हिंदी कहानियों सुनाकर पढ़ाता है शिक्षक*
बायों से बीएससी उत्तीर्ण होने के बाद वर्ष 2013 में राजगढ़ जिले के रवि सोनी की पदस्थापना रोड़िया में हुई थी, लेकिन पिछले वर्ष माता फल्या प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक का तबादला अन्यत्र हो जाने के बाद रवि सोनी के जिम्मे प्राथमिक विद्यालय आया। हमारा घर हमारा विद्यालय के संकल्पना के तहत दो दिनों तक शिक्षक रवि अभिभावकों से संपर्क करता रहा। सभी के नंबर लिए, लेकिन वाट्सअप से अभी यह गांव ठीक से परिचित नहीं हुआ। इसके बाद रवि ने अपने मोबाईल में कई तरह के अलग-अलग एप्प डाउनलोड किए, जिसमें हिंदी और अंग्रेजी अक्षरों की पहचान, पशु-पक्षिओं की आवाज व चित्र, उनके उपयोग तथा अनेक हिंदी कहानियों की विषय वस्तु तैयार की। अब शिक्षक रवि के पास रोजाना 15 से 20 बच्चे बिन बुलाए बिल्कुल सही समय पर प्रातः 10 बजे पहुंच जाते है और मोबाईल से कहानियां सुनने के लिए इंतजार करते है। दोपहर में जब शिक्षक रवि वापस लौटते है, तो होमवर्क के अलावा अनेक गतिविधियों के बारे में बताकर आते है। वास्तव में खरगोन जैसे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में बच्चों, अभिभावकों व शिक्षक तीनों मिलकर घर को ही विद्यालय बनाने की दिशा में अपनी भूमिकाएं निभा रहे है।

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