शिवना शुद्धिकरण”पर्यावरण के महत्व को समझ इसे प्रदूषित होने से बचाये”

2:53 pm or June 5, 2022
( प्रो. खुशबू मंडावरा )
 प्राध्यापक, रसायन विभाग

राजीव गाँधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ,मंदसौर एवं गहरीकरण”

मन्दसौर  ५ जून ;अभी तक;  प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पूरे विश्व मे मनाया जाता है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा  सन 1972 में वैश्विक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्तर पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता हेतु की गयी थी। इसमें प्रत्येक वर्ष 143 से अधिक देश भाग लेते हैं और विभिन्न सरकारी, सामाजिक और व्यावसायिक लोग पर्यावरण की सुरक्षा, समस्या, आदि विषय पर बात करते हैं। प्रत्येक वर्ष कोई न कोई देश इस दिवस की मेजबानी करता है। वर्ष 2019 में भारत ने विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी की, जिसकी थीम “वायु प्रदूषण को हराना ” थी और इस वर्ष मेजबानी स्वेडन करेगा। पिछले कुछ वर्षों की “विश्व पर्यावरण दिवस” की थीम “अवैध वन्यजीव व्यापार के प्रति जीरो टॉलरेंस”, “लोगों को प्रकृति से जोड़ना”, “जैव विविधता” , “प्लास्टिक प्रदूषण”, “पारिस्थिकी तंत्र” ( इकोसिस्टम) रही है। इस वर्ष, 2022 की थीम “ओनली वन अर्थ” अर्थात “केवल एक पृथ्वी “है एवं इस वर्ष का स्लोगन है  ” पृथ्वी के साथ सदभाव से रहना “।
                          पूरा विश्व भले ही विभिन्न  देशों में बंटा हुआ है, लेकिन हम सभी एक ही पृथ्वी साझा करते हैं और इसकी रक्षा करना पूरे विश्व की  सामूहिक जिम्मेदारी है।  हम पढ़ते आये हैं कि पृथ्वी की 70% प्रतिशत सतह पर पानी है परन्तु यह जल  स्तर धीरे धीरे कम होता जा रहा है। एक सर्वे अनुसार यह पिछले कुछ वषों से इसका घटने का स्तर बड़ा है। कुछ वैज्ञानिकों की गणना अनुसार,  पृथ्वी पर जल का द्रव्यमान केवल 0.05% प्रतिशत ही शेष है और यह चिंताजनक है। इसका प्रमुख कारण “ग्लोबल वार्मिंग” है। नासा रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी पर जल का वितरण 97% प्रतिशत  महासागर में एवं 3% प्रतिशत  ताजा जल जो झील,  नदियों आदि के रूप में वितरित है। इस 3% प्रतिशत का केवल 1% प्रतिशत जल ही मानव को उपयोग हेतु मिल पाता है। नदियों का पानी ही हमारे लिए जीवन दायिनी है, इसलिए नदियों का संरक्षण , शुद्धिकरण बेहद जरूरी है। नदियों के प्रदूषित होने का प्रमुख कारण औद्योगिक इकाइयों द्वारा छोड़ा गंदा पानी, अनुपयोगी अवशेष है जो सीधे नदियों में जा मिलता है, जिसमें भारी धोतु जैसे क्रोमियम, लेड, कैडमियम,मरकरी आर्सेनिक आदि रसायन उपस्थित होते हैं। किसानों द्वारा फसलों में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों जैसे नाइट्रेट्स, फॉस्फेट, भारी धातुएँ आदि का उपयोग करना भी पानी प्रदूषित होने के लिए जिम्मेदार है। यह रासायनिक उर्वरक  बारिश में नदियों में जा मिलता है। नदियों , तालाबों के किनारे कपड़े धोना , नहाना,आदि दैनिक क्रिया भी जल प्रदूषण का एक बड़ा कारण है । साबुन, डिटर्जेंट में नॉनबाओडिग्रेडेबल सुल्फोंनेट आयन होते है जो जल में मिल कर उसे प्रदूषित कर देते है। यह सभी हानिकारक रासायनिक तत्व जलीय पौधों , जलीय जंतु जैसे मछलियां, कछुए, आदि को  प्रभावित करते हैं, यह प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया को रोक देते है जिससे जल में उपस्थित ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है और जल का BOD( बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड)  बढ़ जाता है।
              मंदसौर में इन दिनों शिवना नदी का शुद्धिकरण एवं गहरीकरण अभियान चल रहा है जिसमे सरकारी, गैर सरकारी, सामाजिक,राजनैतिक संस्थाए बढ़ चढ़ कर श्रमदान में लगी हुई है जो एक सराहनीय कार्य है। 2002 में शिवना नदी को “राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना” अंतर्गत शामिल किया गया था।
              हमे माँ शिवना की शुध्दता को बनाये रखने के लिए भी प्रयास करने होंगे जिसमे सीवेज लाइन और शहरी घरेलू सीवेज, कचरा आदि की नदी में निकासी को रोकना,  औद्योगिक इकाइयों के कार्बनिक एवं अकार्बनिक  विलायक को भी इसमें मिलने से रोकना होगा। इन विलायकों के ट्रीटमेंट के तरीके खोजने होंगे जो इसमें उपस्थित हानिकारक रसायनों को कम कर सके। इसे रीसायकल करने के तरीके खोजने होंगे। आज कल ग्रीन केमिस्ट्री विषय प्रचिलित है जिसमे नो सॉल्वैंट्स, कम हानिकारक सॉल्वैंट्स का उपयोग एवं सॉल्वैंट्स रीसायकल करने के उपयोगी बिंदु है।
         बड़ी नदियों का उद्धार तभी हो सकेगा जब छोटी- छोटी नदियों की शुद्धता पर ध्यान दिया जाएगा।
             रुके हुए जल में जलकुम्भी तेजी से फैलने वाली खरपतवार है ,जो जल से ऑक्सीजन खींच लेतीं है जिससे मछलियां मर जाती है। यह जैव विविधता ह्रास का भी एक कारण है जो अनेक जलीय प्रजातियों को अपनी उपस्थिति से नष्ट कर देता है। लेकिन यह इस मायने में उपयोगी है कि औद्योगिक बहिस्राव द्वारा किये जाने वाले जल प्रदूषण को रोकने में प्रभावी है। भारत और इथोपिया के वैज्ञानिकों ने जलकुम्भी की मदद से गंदे पानी से क्रोमियम -6 जैसे हानिकारक भारी तत्व को अलग करने की नवीन विधि विकसित की है ( जर्नल ऑफ वाटर रिसोर्स एंड डीसेलिनाशन के अनुसार)। भारी तत्व मानव शरीर के लिए भी हानिकारक है इसकी बेहद कम मात्रा भी शरीर मे पहुँच जाये तो लिवर, किडनी, फेफड़े, खराब कर सकते है तथा कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के भी शिकार हो सकते हैं।पर्यावरण का तापमान ग्लोबल वार्मिंग के कारण लगातार बढ़ता जा रहा है।
                 कार्बन उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है इससे बचने के लिए एक उपाय यह है कि प्रत्येक कार्यालयीन संस्था सप्ताह में एक दिन “नो व्हीकल डे” के नाम पर रखे जिस दिन कोई भी संस्था आने -जाने के लिए अपने व्हीकल का उपयोग ना करे। ऐसा करने से भी कार्बन उत्सर्जन का प्रतिशत कम होगा। पौधारोपण  प्रत्येक वर्ष होता है लेकिन कुछ ही पौधे आगे जाकर वृक्ष का रूप ले पाते हैं। इनके लिए एक अलग केअर टेकर टीम का होना आवश्यक है।
              छोटे छोटे बीज कई बार हमारे घरों के बगीचों में पौधे का आकार ले लेते है उन्हें उखाड़ कर फैंके नहीं बल्कि किसी गमले में लगा दे जब ये थोड़े बड़े हो जाएं तब इनको किसी रिक्त मैदान या घरों के आगे रोपित कर दें। कुछ वर्षों में वो वृक्ष बन जाएँगे। ये काम हम हमारे घरों में मौजुद प्लास्टिक के व्यर्थ डब्बे , बॉटल्स, पोली बैग्स में आसानी से कर सकते हैं।
                 हमे प्लास्टिक का उपयोग भी कम से कम करना चाहिए तथा “यूज़ एंड थ्रो “प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए।  आज कल बाज़ार में यूज़ एंड थ्रो बॉलपेन की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। जिसका कारण इनका सस्ता दाम होना है ,लेकिन ये पर्यावरण के लिए  हानिकारक  है इसके प्रति जागरूकता जरूरी है। हमे रीफिलिंग वाले बॉलपेन का उपयोग करना चाहिए जिससे एक ही बॉल पेन का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके। ऐसी कोई भी चीज़ जिसे हम दोबारा उपयोग नहीं कर सकते ,उसके उपयोग को त्यागना ही बेहतर होगा।  प्रत्येक मनुष्य यदि छोटे-छोटे प्रयास भी करे तो भी हमे बड़े परिणाम मिल सकते हैं और पृथ्वी एवं स्वयं को हम विनाश से बचा सकते हैं।