संघर्षमय जीवन मन को भारी, तन को रोगी, आत्मा को कलुषित करता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर 9 नवंबर ;abhi tak;  वर्तमान का सबसे बड़ा सुख हल्का मन है, मन निरर्थक विचारों से भारी बना रहता है, निरर्थक विचार ही मन को भटकाते रहते हैं, मन का सुख सभी चाहते हैं, पर अपने विचारों का नियंत्रण नहीं कर पाते, मन का काम ही विचार करना है, चाहे सार्थक विचार करें या निरर्थक। निरर्थक विचारों पर अंकुश साधना के द्वारा लगता है, अपने स्वभाव में रमण करना साधना है, स्वभाव में रमण करने वाले साधक द्वन्द्व मुक्त हो जाते हैं, जीवन में जितने द्वन्द्व कम होते हैं, उतने संघर्ष कम होते है, संघर्षमय जीवन मन को भारी, तन को रोगी और आत्मा को कलुषित करता है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘‘सुख का राज क्या है’’ इस विषयक परिचर्चा को प्रसारित करते हुए कहे। आपने कहा-प्रचुर धन, सुंदर भवन, अच्छे वसन और स्वादिष्ट भोजन ही सुख का आधार नहीं है, सुख वह है जो मन को हल्का रखें और सुखी वह है जो मन से हल्का रहे। हल्का मन ही शक्तिशाली होता है। जिस मन में संकल्प-विकल्प के ज्वार उमड़ते है वो शक्तिशाली नहीं रहता, वह कमजोर हो जाता है, इन ज्वारों में वेग होता है, वेग मन को आवेग से जकड़ देता हैं वेग जिनके शांत होते है वह सुखी होता है। सुख पाने के सूत्र है-जीवन में आसक्ति कम करो, धन के प्रति पागलपन कम रखो, जो सामने आ रहा है उसे स्वीकार करते चलो, प्राप्त में संतोष और अप्राप्त के लिए व्यर्थ दौड़ बंद करना। जो बुरी आदतों को त्याग देता है वो सुखी रहता है। बुरी आदतें ही व्यक्ति को दुःख की ओर धकेलती है जो अपने को अच्छी आदतों में डाल लेता है वह सदा सुख और शांति पाता है।
                   आचार्य श्री ने कहा-असंतोष सबसे बड़ी समस्या है, व्यक्ति को किसी वस्तु से संतोष ही नहीं होता भले ही वह कितनी मात्रा में प्राप्त हो जाए, असंतोष की कभी आग बुझती ही नहीं, यह खड्डा कभी भरता ही नहीं, दुःख का सबसे बड़ा कारण असंतोष है, संतुष्ट मन ही सुखी रहता है। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है, और उपलब्धियों से प्राप्त सुख क्षणिक होता है मगर संतुष्ट मन की उपलब्धि सर्वोपरि होती है और स्थायी होती है।
आचार्य श्री ने कहा- सही सोच, सही नजरिया, सही वाणी प्रयोग, सही व्यवहार, सही आदतें, सही नीति और सही निर्णय व्यक्ति के मन को हल्का रखते हैं इनमें एक में भी कमी आती है तो मन भारी होने लग जाता है। मन का भारीपन तन के भारीपन से भी खतरनाक होता है। तन जितना घूमें उतना ही स्वस्थ रहता है और मन जितना स्थिर रहे उतना ही स्वस्थ रहता है। स्वस्थ मन में ही सारे सुख छिपे रहते है। आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते पर आप अपनी आदतें बदल सकते है और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देगी। मन आदतों के कारण ही भारी होता है, एक ही बात पर बार-बार सोचते रहते की आदत मन को भारी बना देती है, जो कार्य हो चुका है अब उसके बारे मे क्या सोचना, जो कार्य अभी हुआ नहीं, होने वाला है उसके बारे में भी बार-बार क्या सोचना ? जब जैसा होगा तब देखा जायेगा इस चिंतन पहलू से मन शांत रहता है। पैर से कांटा निकल जाए तो चलने में मजा आता है और मन में दुश्चिंता निकल जाए तो जीवन जीने का आनंद आता है। भाग्यशाली ही चिंता मुक्त रहकर जीने का आनंद लेते है, अभागे नहीं भाग्यशाली बनों यही मन को हल्का रखेगा और निरर्थक विचारों से मुक्त रखेगा।

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