सत्य का सूर्य आवृत्त हो सकता है, मगर अस्त नहीं होता -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १६ नवंबर ;अभी तक; मन, वचन, काया की ऋजुता तथा कथनी करणी की समानता ही सत्य है। सत्य ही भगवान है, जो सत्य भगवान को समर्पित होता है वह सच्चा भक्त कहलाता है। जिसके जीवन में सत्य की साधना है, संसार की कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती। सत्य का साधक जो जैसा है, उसे वैसा मानता है और वैसा ही बताता है। वास्तविकता ही सत्य है, उसे उसी रूप में सोचना, स्वीकार करना, व्यवहार में लाना सत्य है। सत्य में सारे सदाचारों का समावेश हो जाता है। सत्य से शून्य सदाचार दम्भ, दिखावा और पाखण्ड बन जाते है, सदाचार का प्राण तत्व सत्य है। सत्य सदैव स्पष्ट और सुलझा हुआ होता है उसमें किसी प्रकार का अवरोध नहीं होता। सन्देह, अविश्वास सत्य के नहीं असत्य के साथी होते है। पारस्परिक विश्वास की पृष्ठभूमि सत्य से निर्मित होती है। कुटिलता नहीं सरलता ही सत्य का हृदय होती है।
                         ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में आयोजित धर्मसभा में जैनाचार्य श्री विजयराजजी महाराज ने कहे। आपने कहा- सत्य ही यशस्वी जीवन देता है, सत्य सबसे बड़ा शास्त्र है, सत्य ही विश्वास है, सत्य की प्राप्ति में ही व्यक्ति का पूर्ण विकास है। सत्य सदा व्यापक होता है। देश, काल की सीमाएं सत्य को सीमित नहीं बना सकती यह त्रैकालिक अखण्ड तत्व  होता है। सत्य की विशेषता यही होती है, इसमें विरोधी युगल का सहअस्तित्व एक साथ रह सकता है। किसी के अहित में अपना हित, किसी के हृास में अपना विकास और किसी के दुःख में अपना सुख सत्य का साधक नहीं चाहता। सत्य का साधक सबके हित, विकास और सुख के लिये समर्पित होता है। यही सत्य के साधक की कसौटी होती है। सबके लिऐ जीने वाला अपना जीवन यूं ही प्रशस्त बना लेता है। सत्य की जब उपेक्षा होती है, मानव चोट खाता है, सत्य उपेक्षा जीवन नहीं है, इसमें जन जीवन की शांति और विश्व शांति की शक्ति निहीत होती है।
                      आचार्य श्री ने कहा-सत्य चार द्वारों से प्रवेश करता है- कर्म की ऋजुता, भाव की ऋजुता, भाषा की ऋजुता तथा कथनी करणी का अविसंवादिता, इन चारों द्वारों से सत्य जीवन में प्रवेश करता है। याद रखें- मुसीबतों में सत्य का आचरण करना महानता का आदर्श है, महान व्यक्ति ओर सबको छोड़ सकते हैं पर सत्य को नहीं छोड़तें। सत्य की नौका पर आरूढ़ होकर ही वे संसार सागर को तैरते हैं। सत्य का साथी समय है, समय पर ही उसके मधुर फल प्राप्त होते है। सत्य सूर्य आवृत्त हो सकता है पर कभी अस्त नहीं होता, कितनी भी भ्रांतियाँ क्यों न पैदा कर दी जाए भ्रांति के बादल सत्य के सूर्य को ढक सकते है मगर सत्य को नष्ट नहीं कर सकते। सत्य मात्र शब्दों में नहीं रहता, वह भावों में रहता है, केवल शब्दों को पकड़ लेने से कोई भी व्यक्ति सत्य तक नहीं पहुंच सकता। अभय बने बिना सत्य जीवन में नहीं उतरता, अभय और सत्य हमारे जीवन के उच्च व सशक्त सहचर बनें इसके लिये सभी को प्रयास करना चाहिए

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