सनातन धर्म का पुनः स्वर्णीम समय लाना है तो गुरूकुलों की स्थापना करना होगी – चैतन्यानन्दगिरीजी मसा

3:16 pm or July 25, 2022

महावीर अग्रवाल

मंदसौर २५ जुलाई ;अभी तक;  नगर के खानपुरा स्थित श्री केशव सत्संग भवन में श्री चैतन्यानन्दगिरीजी मसा का दिव्य चातुर्मास चल रहा है। जिसमे प्रवचनों के अंतर्गत संतश्री द्वारा भक्तों को श्रीमद् देवी भवगती महापुराण का श्रवण करवाया जा रहा है। रविवार को संत श्री द्वारा श्रीमद् देवी भवगती महापुराण के 12 स्कंदों में द्वितिय स्कंद का वाचन प्रारंभ किया। संतश्री द्वारा प्रतिदिन प्रातः 8 बजे से 10 बजे तक प्रवचन दिये जा रहे है।

24 जुलाई रविवार को धर्मसभा में चैतन्यानन्दगिरीजी महाराज साहब ने बताया कि वेदव्यासजी की माताजी उत्पत्ति हुई जिनका नाम मत्स्यगंधा था। लेकिन सत्य को कभी नही छोडने के कारण वेदव्यासजी की माताजी मत्स्यगंधा आगे चलकर सत्यवती के नाम से जानी गईं। धर्मसभा में संतश्री ने बताया कि महात्रषि पराशर और सत्यवती से वेदव्यास जी की उत्तत्ति हुई। आपने बताया कि वेदव्यास जी जन्म से ही घर छोडकर जंगलों में चले गये संन्यासी जीवन व्यतित करने लगे। आगे चलकर वेदव्यास जी ने आश्रम बनाया और वहां पर गुरूकुल की स्थापना की उस गुरूकुल में वेदव्यास जी द्वारा बच्चों को शिक्षित किया जाता था। संतश्री ने बताया कि यदि हमें आज भी अपने सनातन धर्म को स्वर्णीम दौर में ले जाना है तो हमें गुरूकुलों की स्थापना करना होगी। भोजन कार्यक्रम, मंदिर में दान कम देना या मत देना लेकिन गुरूकुल की स्थापना के लिए दाव अवश्य देना।

महापुरूष जो करें वो कभी नहीं करना, जो कहें वो करना

धर्मसभा में चैतन्यानन्दगिरीजी ने बताया कि हमे वो कभी नहीं करना चाहिए जो महापुरूष करते है क्योंकि जो वे कर सकते है हम नहीं कर सकते। हमें वहीं करना चाहिए जो महापुरूष कहें। अर्थात् हमें महापुरूषों के कथनों का पालन करना चाहिए। धर्मसभा में संतश्री ने भीष्म पितामह की उत्पत्ति का वृतांत भी सुनाया।
धर्मसभा में जगदीशचंद्र सेठिया, राधेश्याम गर्ग, शंकरलाल खत्री, आदि उपस्थित थे।