समभाव से बड़ी न कोई साधना है न कोई औषधि है जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मंदसौर २४ सितम्बर ;अभी तक; आगन्तुक कष्टों को सहने से और समभाव रखने से कर्मों की निर्जरा होती है, नये अशुभ कार्यों का बंध नहीं होता, शांति, समाधि व संतुष्टि बनी रहती है। इसके साथ ही भगवान की आज्ञा का पालन व आंतरिक मजबूती बढ़ती है। कष्ट सहिष्णु बने बिना महान उपलब्धियों की प्राप्ति संभव नहीं होती, कष्ट तो क्षणिक होते हैं, वे आते-जाते रहते हैं, हमारे अन्दर वह शक्ति होनी चाहिए जिससे हम हंसते-हंसते कष्टों को सहन कर ले। हंसकर कष्टों का सहन करने वाला वीर होता है और कष्टों में रोने वाला कायर होताा है। जो कष्टों की आग में तपना जानता है वहीं अपने जीवन को कुंदन की तरह चमकाता है, सोना आग का स्पर्श पाकर ही तो कुंदन बनता है। अगरबत्ती जलती लौ का स्पर्श पाकर ही सुगंध बिखेरती है, संसार में जितने भी महापुरूष हुए हंैं उन्होंने कष्टों का स्वागत किया तभी उनके जीवन में महानता प्रदीप्त हुई, कष्टों से घबराकर पलायन करने वाले व्यक्तियों को महापुरूषत्व का गौरव प्राप्त नहीं हुआ।
                ये विचार शास्त्री काॅलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- प्रबल आस्था और प्रखर पुरूषार्थ इन दो के सहारे व्यक्ति बड़े से बड़े कष्ट के समन्दर को तैर सकता है। कष्टों के आते ही व्यक्ति ही आस्था डावाडोल होने लगती है वह सोचता है-मैंने इतना धर्म ध्यान, दान-पुण्य, पूजा-पाठ किया फिर भी मेरे जीवन में कष्ट ही कष्ट क्यों आ रहे है, ये कष्ट मेरा पीछा ही नहीं छोड़ते, इन धर्म ध्यान में कुछ नहीं धरा है, ये बकवास है, ढांेग है, अब मुझे कुछ नहीं करना, ऐसी नकारात्मक मनःस्थिति उसकी बन जाती है इसके विपरित अगर वह यह सोेंचे-जीवन में बहुत सी मुश्किले आती है लेकिन कभी किसी से शिकायत नहीं करूंगा क्योंकि भगवान ऐसा डायरेक्टर है जो सबसे कठिन रोल बेस्ट एक्टर को ही देता है। मैं बेस्ट एक्टर हूं इस फील्ड का इसलिये मुझे कष्टों भरे रोल मिले है, मुझे इस परीक्षा में पास होना है, ये कष्ट तो कुछ नहीं है। इनसे बड़े कष्ट भी आयेंगे तो मैं सहिष्णु बनकर आगे बढ़ूंगा, जिसे कष्ट, अष्ट है वहीं मिष्ट होता है उसे ही अभीष्ट सफलता प्राप्त होती है। प्रबल आस्था से ही प्रखर पुरूषार्थ होता है जिससे कष्टों का सागर पार हो जाता है।
                    आचार्य श्री ने कहा-आज हमारे जीवन में जो कष्ट आ रहे है वो तो प्रतिक्रिया मात्र है, हमने पूर्व में किसी को कष्ट दिये थे वो आज उदय में आ रहे है यह तो क्रिया की प्रतिक्रिया है। अगर कष्ट नहीं दिये गये होते तो कष्ट उदय में आते ही नहीं, उदय नाम से समभाव रखना ही साधना है, ये कष्ट तो हमारे समभाव की कसौटी है इस पर खरा उतरना ही हमारा सच्चा साधकत्व है। जो इस पर खरे नहीं उतरते वे साधना से प्राप्त होने वाले आनंद से वंचित रह जाते है। कष्टों की जंती से निकलने पर ही साधना में स्थिरता, गंभीरता और पवित्रता आती है इस सत्य को समझने वाला ही कष्ट सहिष्णु साधक होता है। उसे वांछित सिद्धि प्राप्त होती है। कोरोना महामारी के चलते हर मानव को कष्ट सहिष्णु बनना चाहिए इससे हर आगंतुक कष्ट में समभाव बना रहेगा, समभाव से बड़ी न कोई साधना है, न कोई औषधि।

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