सियासत के चलते बार बार दुबारा चुनाव होने के चक्रव्यूह में फंसी नेपा विस सीट-

मयंक शर्मा

खंडवा ५ अक्टूबर ;अभी तक; विधानसभा उपचुनाव को लेकर सुखर््िा्रयो मे आई कागज नगरी नेपानगर वेसे तो सार्वजनिक क्षेत्र के
अखबारी कागज कारखाने  नेपा लिमिटेड के कारण एशिया प्रसिद्ध रही लेकिन 3 साल से रिर्वोनेशन के नाम पर यहां चल रह तालेबंदी के बाद पूरी नगरी का गौरव खो गया है।चर्चा में है ता केवल सियासत।

मंगलवार को ेनेपानगर विधानसभा अपनीे  43वीं वर्षगांठ मनाने जा रही है। 6 अक्टूबर 1977 को यहां से पहले विधायक चुने गए थे। तब देश व प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार थी। लेकिन ढाई साल भी जपा सरकार नहीं टिक पाई । देश -प्रदेश में मध्याववधि  चुनाव हुए और आपातकाल के देश व्यापी आक्रोश से  मुक्त होकर कांग्रेस फिर सत्ता मे लौट आई।

आपातकाल के  बाद अस्तित्व में आाया नेपा विस क्षेत्र का पहला चुनाव हास्यास्पद की स्थिति से कांग्रेस को गुजरना पडा। प्रभावशाली हुये तत्कालीन कांग्रेस सांसद की मंशा अनुरूप बिना नाम भरे टिकट दे दिये गये और क्षेत्रीय सांसद शिवकुमारसिंह (अब स्व0) ने अपने छर्रे की उम्मीदवारी का नाम तय किया तो वे भाग खडे हो गये। उस समय ठा सिंह नेे ं इस प्रतिनिधि मे चर्चा ूू कहा के अजीबोगरीब संकट खडा होने पर उन्होने  ें समयाभाव को देखते  हुये ें अपने एक साथी ठेकेदार व लायंस क्लब सदस्य तनंवतसिंह कीर को उनकी अनिच्छा के बावजूद जबरन चुनाव मैदान में उतारा। वे 77 का चुनाव हार गये लेकिन ढाई साल बाद चुनाव का मौका आने पर फिर लडाया और ं नेपा विस सीट से विजयी हुये । सांसद के दबाव के चलते 1983 में अर्जुनसिंह केबीनेट में श्री कीर सहाकारिता उप मंत्री बने।

क्रमांक ं 285 नंबर का यह नेपानगर विधानसभा सीट का पहला विधायक जनता पार्टी के चुने गए थे। तब  प्रो. ब्रजमोहन मिश्रा (अब  स्व.)7 हजार 666 मतों से विजयी हुए थे। इसके बाद 1980 में तनंवतसिंह कीर चुने गये लेकिन सीट की यह परंपरा रही है कि यहां बारी बारी से वह भाजपा कांग्रेस को मौका देती है।

प्रो. मिश्र सीट से े दो बार चुनाव जीते थे। जनता पार्टी से ब्रजमोहन मिश्र वर्ष 1977 में पहली बार और भाजपा से वर्ष 1990 में दूसरी बार विधायक चुने गए थे। उन्होंने दोनों बार तनवंतसिंह कीर को हराया था। पहले कार्यकाल के आखिरी में प्रो. मिश्रा 28 दिन तक वन मंत्री भी रहे।
तनंवत सिह कीर लगातार 3 बार विधायक चुने गये। अनारक्षित सीट अजजा के पाले में जाने के बाद  फिर उन्हे मौका  नहीं मिला। कांग्रेस के तनवंतसिंह कीर वर्ष 1980, 1985 और 1990 में चुने गये। तीनों बार उन्होंने पलटवार करते हुये प्रो. मिश्र को हराया। नेपानगर सीट पर कीर पहले ऐसे विधायक रहे, जो तीन बार लगातार जीते। इस बीच वे जीत के प्रत्येक बाद मंत्री भी रहे।

भाजपा से राजेंद्र दादु 2008 में पहली और 2016 में दूसरी बार विधायक रहे। पहली बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। दूसरे कार्यकाल में उनका सड़क हादसे में निधन हो गया। इसके बाद हुए उपचुनाव में उनकी बेटी मंजू दादु भाजपा से विधायक चुनीं गईं। 1998 में कांग्रेस के रघुनाथ चैधरी और 2003 में भाजपा की अर्चना चिटनीस एक-एक बार विधायक रहीं। दोनों ने पांच-पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। 2016 में मंजू दादु और 2018 में कांग्रेस से सुमित्रा कास्डेकर विधायक रहीं। कासडेकर इस्तीफा देकर भाजपा  का पलला पकडने ये सिक्त सीट के उपचुनाव मे अस बार उन्हें भाजपा ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है। अब तक मंजू व सुमित्रा दोनों का विधायक कार्यकाल दो-दो साल का रहा।मूंजू को अपनी विरासत खोने को लेकर उनमे नाखुशी है। वे नामजदगी पर्चा भरने के अंतिम समय तक कोई करिश्ता दिखा जाये तो असातान्य नही होगा।

43 वी वर्षगांठ तक पहुंचने तक नेपानगर विस सीट के आरंभिंक मतदाता संख्या  60 हजार की तुलना में कई गुना इजाफा होकर चैगुनी हो गयी है।  मौेजूदा स्थिति में यहां अब 1 लाख 23 हजार 554 पुरुष और 1 लाख 17 हजार 469 महिला मतदाता हैं जो उपचुनाव में मतदान हकदार होगे।
प्रदेश का पश्चिमी अंचल के सरहइ की नेपानगर विस पडौसी राज्यं महाराष्ट्र के अमरावती और बुलढाणा जिलो की सरहद से सटा है। निर्वाचन अधिकारी की माने तो 24 मतदान केंद्र ऐसे है, जहां से महाराष्ट्र की सीमाएं नगदीक  हैं। सीमा पर कोरोना को लेकर पहले से जांच हो रही थी। अब आचार संहिता को लेकर भी जांच हो रही है।

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