सीएम ने जननायक टंट्या मामा के जो कड़े म्यूजियम के लिए मांगे वे तखतसिंह के वंशज  नर्मदा में कर चुके स्वाह

मयंक शर्मा
खंडवा २५ नवंबर ;अभी तक; ।4 दिसंबर 1889 को फांसी से पहले टंट्या मामा की अंतिम इच्छा थी कि
मेरे ताबीज व कड़े मेरे मालिक को निशानी के रूप में पहुंचा देना। जिले के
पंधाना ब्लाक के ग्राम घाटाखेड़ी के राजा तखतसिंह उन्हें सहयोग करते थे,
इसलिए उन्हें टंट्या मामा मालिक कहते थे।
                अंग्रेजों से बचने के लिये वे घाटाखेड़ी में तखतसिंह की हवेली में रुकते थे।
प्रदेश मुख्यमंत्री ने कहा था कि घाटाखेड़ी में टंट्या मामा के जो कड़े रखे
हैं, वह मुझे दिला दो, हम उन्हें संग्रहालय में रखेंगे लेकिन  अब संभव
नहीं है। टंट्या भील के शहीद होने के 132 साल बाद प्रदेश सरकार ने उनकी
स्मृतियों को संवारना शुरू किया है। पांच दिन पहले जिले के पर्यटन स्थलं
हनुवंतिया में जल महोत्सव के शुभारंभ में आए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चैहान ने कहा था कि टंट्या मामा का कडा उन्हें उपलब्ध करा  दे तो
संग्रहालय में धरोहर रूप में सजां देगे।
                 टंट्या मामा  ताबीज के साथ ही बाजू में बांधे जाने वाले अष्ट धातु के कड़े
को घाटा खेड़ी के राजा तखत सिंह  को अपनी निशानी के रूप में पहुंचा देने
की  इच्छा जता देने के लिये उनके सुपुर्द की गयी थी। ट्टया मामा को 4
दिसंबर 1889 को फांसी पर लटका दिया गया था।
               घाटा खेडी के राजा तखत सिंह की चैथी पीढ़ी के वंशज 82 वर्षीय ठा. शिवचरण
सिंह ने बताया कि ताबीज व अन्य सामान ठा. खुमान सिंह, ठा. माधवसिंह ने
संभालकर रखे थे। इन्हें मेरे पिता भगवंत सिंह ने नर्मदा में विसर्जित कर
दिए थे। इसके बाद कड़े अलमारी में नजर आए थे। मैंने तीन साल पहले
ओंकारेश्वर पहुंचकर बीच नर्मदा में पहले विसर्जित की गईं अन्य वस्तुओं की
तरह इन कड़ों को भी विसर्जित कर दिया था।
               ठा.शिवचरण सिंह ने बताया कि राजा तखत सिंह के समय 30 गांव उनके पास थे।
इन्हें में बड़ौदा अहिर गांव भी शामिल था जेा टृटया मामा की जन्म स्थली
थी। इसी गांव में क्रांतिकारी टंट्या मामा रहते थे। अंग्रेजों से बचने के
लिए वे अक्सर घाटाखेड़ी की हवेली में आकर रुकते थे। हमारे पूर्वज उनका
सहयोग करते थे। इसलिए वे मालिक कहते थे।ठा. शिवचरण ने कहा कि कडा
यंग्रहालय मे सेजोया जायगा यह पहले पता होता तो विसर्जित नहीं करते जो
तीन साल पहले कर चुके है। उन्हे अफसोस है कि कडे संग्रहालय में रखे जाते
तो हमारे गांव के साथ ही देने वालों में मेरा नाम भी होता लेकिन अब कुछ
नहीं कर सकते।

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