सुख में गर्व नहीं तो दुःख में गम नहीं यह समझ के होने का परिणाम है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १६ सितम्बर ;अभी तक;  सुख सभी चाहते है और सभी सुखी भी रहना चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता और दुःखी रहना भी कोई नहीं चाहता, छोटा सा दुःख आ जाए तो मानव चाहेगा जल्दी से जल्दी वह दुःख दूर होना चाहिए। जब छोटा सा दुःख भी बर्दाश्त नहं हो सकता तो बड़ा दुःख कैसे बर्दाश्त हो सकता है, सच्चाई यह है, दुःख भोगे बिना सुख का स्वाद नहीं आता, जितने भी सुख हैं वे सब दुःख प्रतिष्ठित है। सुख-दुःख समझ के परिणाम है अगर समझ सही है तो मानव दुःखद माहौल में भी सुखी है और समझ गलत है तो सुख-सुविधा भरे माहौल में भी दुःखी है। समझ सही रखना ही सुख का मूल केन्द्र है। समझ मनुष्य का मौलिक गुण है, यह पशु और मनुष्य के बीच फर्क करता है। जीने के लिये तो सभी जीते हैं पर जीने का कोई सार्थक उद्देश्य भी होना चाहिए, उद्देश्य के साथ व्यवस्था, प्रबंधन, कार्य संयोजन, पुरूषार्थ, विश्वास, उत्साह और आस्था भी होनी चाहिए। ये सब बिना समझ के विकसित हुए नहीं हो सकती। सही समझ का विकास ही उपलब्धि भरे आंकड़े जोड़ सकता है, सभी उपलब्धियां सुख की प्राप्ति में सार्थक हो जाती है।
                       ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन से विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने 16 सितम्बर, बुधवार को प्रसारित अपने संदेश में कहे। आपने कहा- सुखी कौन है यह सवाल कई बार सामने आता है, जो शरीर और मन से स्वस्थ है वह सुखी है। एक दृष्टि से यह आज की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता है, कई शरीर से स्वस्थ होते है मगर उनका मन अस्वस्थ रहता है। मानसिक दृष्टि से वे चिंतित, बैचेन और तनावग्रस्त रहते है, छोटी सी घटना उनके लिये दुःखदायी बन जाती है। मन इतना कायर, कमजोर, भयाक्रांत रहता है, मन के अस्वस्थ रहते वे तन की स्वस्थता का भी लाभ नहीं उठा पाते है। मन, निभ्रांत, निर्भय और निराकुल रहता है सही समझ से। समझ में यह सत्य समा जाना चाहिए जो होना है वो होकर रहेगा और जो नहीं होना है वह नहीं होगा, लाख कोशिशें कर ले, नहीं होता है तो नहीं होगा, इस सत्य समझ के विकसित होते ही मन का भय, भ्रम, वहम और भ्रांतियां दूर हो जाती है और व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सबल हो जाता है। सुख साधनों में नहीं सुख सही समझ से बसा रहता है। साधन सम्पन्न व्यक्ति अगर सही समझ नहीं रखता है तो वह हर समय कुंठित, उत्पीड़ित और भयभीत रहता है। शरीर स्वस्थ और मन तंदुरूस्त जिसका होता है वह वर्तमान का सबसे बड़ा सुखी व्यक्ति होता है। समझ का सही दृष्टिकोण सोए मन को जगाने की दस्तक है, यह वह प्रयत्न है जो भ्रम के पर्दे को उठाकर सत्य से रूबरू करा देता है। यह वह संकल्प है जो अशेष कार्यों को मंजिल तक पहुंचा देता है। यह वह विश्वास है जो स्वयं को बदलने का, क्योंकि जिसमें सही समझ का दृष्टिकोण विकसित हो जाता है उसे शरीर और मन का स्वास्थ्य उपलब्ध हो जाता है। ऐसा व्यक्ति कभी भी कम साधनों का रोना नहीं रोता, न्यूनतम साधनों में रहकर भी वह उच्चतम श्रेष्ठतम जीवन जीेने का अभ्यासी बन जाता है। सुख और कहीं नहीं हमारे समझ भरे दृष्टिकोण में हैं, यह दृष्टिकोण ही हमारी जीवन सृष्टि को प्रेममय, मधुरतामय, समतामय और सुखमय बनाता है। कोरोना महामारी के चलते हर व्यक्ति को अपनी समझ शक्ति की पहचान करनी चाहिए और उसमें आवश्यक बदलाव लाना चाहिए। इसी से सुख में गर्व नहीं होगा और दुःख में गम नहीं होगा।

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