स्कूल बसों के लिए कठोर नियम बनना आवश्यक; विद्यार्थी एवं अभिभावक बेबस है

महावीर अग्रवाल 
      मन्दसौर  १३ अक्टूबर ;अभी तक;   वर्तमान समय में संपूर्ण मध्यप्रदेश में स्कूल बसों को लेकर अनेक अभिभावक चिंतित और परेशान है किंतु अपने बच्चे की पढ़ाई को लेकर बेबस है क्योंकि-
(1) स्कूल बसों की सीटें कंफर्टेबल नहीं है- स्कूल बसों का बॉडी स्ट्रक्चर कुछ इस प्रकार से डिजाइन किया गया है की अधिक संख्या में बच्चे यात्रा कर सकें और इसलिए बच्चों को बैठने के लिए आरामदायक सीटें नहीं है और उस पर जितनी सीटर बस आरटीओ से पास होती है उससे दुगनी और ढाई गुनी संख्या में बच्चों को बैठाया जाता है।
(2) स्कूल बसों में छात्रों को बहुत अधिक समय बैठना पड़ता है– अभी स्कूल बसों के राउंड इतने लंबे हो रहे हैं छात्रों को कम से कम 1 घंटे और अधिकतम 3 घंटे बस में बैठना पड़ता है और यह भी बस के एक तरफ के राउंड की समय सीमा है छोटे स्थानों पर स्कूल वाले 20 से 25 किलोमीटर दूर से बच्चे ला रहे हैं और महानगरों में 50 से 60 किलोमीटर की दूरी तक से ग्रामीण क्षेत्रों से बच्चों को बसों में लाया जाता है इससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है इसलिए बच्चों को अधिकतम 10 किलोमीटर से ही उठाना ठीक रहेगा ताकि वह आधे घंटे तक ही बस में बैठ सके आज महानगरों की स्थिति यह है की वहां के विद्यालय प्रातः 9 से 3 तक चलते हैं इसलिए उसमें नर्सरी से लेकर के हायर सेकेंडरी तक के बच्चे सुबह 6 बजे उठते हैं और 7 बजे स्कूल बस में बैठते हैं और 9 बजे स्कूल पहुंचते हैं और वापस वहां से बस वहां से 3 बजे बैठते हैं और करीब 5.30 बजे घर पहुंचते हैं और यदि ट्रैफिक जाम हो तो कभी-कभी घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा भी हो जाता है इसलिए शासन को इस दिशा में ध्यान देना आवश्यक है।
(3) सेकंड हैंड एवं पुरानी खटारा बसों को बदलना होगा- अधिकांश स्कूलों में 10 से 20 साल पुरानी स्कूल बसों का संचालन किया जा रहा है जब वो चलती है तो उसके अस्थि पंजर आवाज करते हैं कभी पंचर तो कभी मैकेनिकल समस्या होने के कारण रास्ते में ही बसें खराब हो जाती है और घंटों बच्चों को भूखे प्यासे उस बस में ही प्रतीक्षा करनी पड़ती है और यह शिकायत आए दिन बनी रहती है इससे निजात पाना आवश्यक है।
(4) क्लीनर एवं कंडक्टर का प्रमाणिक परीक्षण- आए दिन स्कूल बसों की शिकायत मिलती है की छात्र छात्राओं के साथ क्लीनर और कंडक्टर द्वारा गंदी गंदी हरकतें की जाती है इसमें कुछ उजागर होती हैं और कुछ डर से सहमे बच्चे अत्याचार सहते रहते हैं अनेक ऑटो रिक्शा मैजिक और स्कूल बसों में टेप रिकॉर्डर लगा रहता है और उसमें अश्लील और गंदे गीत बजाए जाते हैं कई बार तो जो स्कूल स्टाफ उनके साथ चलता है वह भी इन गीतों का आनंद लेता रहता है इसके कारण बच्चों पर गलत संस्कार पढ़ते हैं और यह और भी दुर्भर हो जाता है जब को-एजुकेशन के अंतर्गत छात्र-छात्राएं एक साथ बस में यात्रा करते हैं इसलिए इस पर भी नियंत्रण आवश्यक है।
 (5) आवारा और ढीठ लोगों का स्कूल बसों में चढ़ना- यही नहीं ग्रामीण क्षेत्र में चलने वाली बसों में ग्रामीण क्षेत्र के आवारा और ढीठ किस्म के लोग स्कूल बसों को रोककर उसमें चढ जाते हैं और अनुचित एवं असभ्य शब्दावली का प्रयोग करते हैं तथा कभी-कभी तो ये बिडी सिगरेट भी पी लेते हैं और हद तो तब होती है जब यह ग्रामीण नशे में ड्राइवर कंडक्टर से बदतमीजी करते हैं और मारपीट भी करते हैं एवं धमकियां देते हुए यह कहते हैं कि इस रूट पर बस चला कर देखना! यह एक गंभीर परिस्थिति है जिसके कारण स्कूल संचालक बहुत परेशान है इसलिए शासन को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए ।
इस प्रकार स्कूल बसों में भिन्न-भिन्न प्रकार की समस्याएं हैं जिसका निराकरण बहुत ही आवश्यक है इस दिशा में शासन प्रशासन सहित मानव अधिकार आयोग को भी ध्यान देकर इन समस्याओं को संज्ञान में  लेना चाहिए।
 ( रमेशचन्द्र चन्द्रे )

Post your comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *