9 जून बलिदान दिवस ; क्रांतिसूर्य, वनवासियों का “धरती बाबा” बिरसा मुंडा

  महावीर अग्रवाल
    मंदसौर ८ जून ;अभी तक;      भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वनवासी समुदाय भारी मात्रा में विद्यमान है ये एक सीधी-सादी एवं भोली भाली जाति के लोग  है जो उस समय वन उपज से ही अपना जीवन चलाते थे और पहाड़ी क्षेत्रों में छोटी मोटी खेती करके थोड़ी फसल उगाते तथा उसे बेचकर अपना गुजारा किया करते थे ।
         एक समय था जब छत्तीसगढ़ ,बिहार और झारखंड क्षेत्र में इतने घने जंगल थे की सूर्य की रोशनी भी जमीन पर नहीं पड़ती थी, ऐसे घने जंगलों में हिंसक जानवरों के बीच नदी ,पहाड़ और वनों को अपन मित्र बना कर कच्ची झोपड़ियों में निवास करने वाली जातियों की तरफ किसी भी राजा महाराजा और बादशाहो का ध्यान नहीं जाता था। ऐसे ही उपेक्षित क्षेत्र, झारखंड के छोटा नागपुर पठार के एक गांव उलीहातू जिला राँची  में एक वनवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को एक गरीब परिवार में हुआ था। गाय ,भैंस ,बकरी और भेड़े चरा कर यह चरवाहा जंगल में बांसुरी बजाते बजाते अंग्रेजों की बैंड बजा देगा यह किसी को कल्पना नहीं थी।
            निकटतम साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे गोस्नर एवं जिलकल लुथार नामक विद्यालय में पढ़ाई करते हुए यह मन ही मन हमेशा ब्रिटिश शासकों द्वारा की गई आदिवासी समाज की  दुर्दशा पर सोचते रहते थे। उन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए मुंडा जाति को अपना नेतृत्व प्रदान किया।1894 में सूखा पड़ने के कारण छोटा नागपुर में भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। लोग महामारी के कारण मर रहे थे, इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी किंतु बिरसा मुंडा ने पूरे मनोयोग से अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा की उस जमाने में भी महामारी मे संक्रमण के डर से लाशों को हाथ नहीं लगाते थे किंतु बिरसा मुंडा ने उस समय भी मृतक व्यक्तियों का सामूहिक दाह संस्कार किया अर्थात सेवा और नेतृत्व का गुण  उनके जीवन के प्रारंभिक काल में ही  था।
      इसी सिलसिले में 1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को बिरसा ने एकत्र कर ,क्षेत्र में सूखा पड़ने के कारण अंग्रेजो से लगान (कर) माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके साथियों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और जिसके कारण उन्हे अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा मिल गया था। उन्हें उस इलाके के लोग “धरती बाबा” के नाम से पुकारते और पूजा करते थे। उनके प्रभाव के कारण पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जाग गई।
                अंग्रेजों की अनदेखी और ‘उलगुलान’ अर्थात आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी के संघर्ष को लेकर उन्होंने 400 वनवासियों की तीर कमान से लैस एक सेना भी बनाई थी जो अंग्रेजों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का विरोध करो युद्ध करती थी जिसके कारण बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक कहलाते है।
              बिरसा आन्दोलन जहां अंग्रेजों से मुक्ति के लिए संघर्षरत था वही उनका एक  आर्थिक उद्देश्य भी  था । दिकू जमींदारों अर्थात गैर-आदिवासी जमीदारों द्वारा हथियायी गई जमीन मुक्त करा कर आदिवासियों की जमीन वापस करने के लिए  आदिवासी लम्बे समय से संघर्ष कर रहे थे। इसी आंदोलन को शक्तिशाली बनाने के लिए बिरसा मुंडा ने अपना धर्म समझ कर  मुंडाओं को संगठित किया ।
           आज ही की तरह क्रिश्चियन मिशनरीया  उस समय भी आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करने के लिए चिकित्सा, शिक्षा और सेवा की नौटंकी करती थी और उनके झांसे में भोले भाले आदिवासी अपना धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन रहे थे। यह देखकर बिरसा मुंडा ने उनका जबरदस्त विरोध किया और ईसाई बने हुए आदिवासियों को वापस हिंदू धर्म में लाने के प्रयास शुरू किए! बिरसा मुंडा के विरोध के कारण ईसाई मिशनरीया वहां अपने पांव नहीं टिका पाई इसी वजह से अंग्रेजों की वक्र दृष्टि बिरसा मुंडा पर पड़ी और वह उसके क्षेत्र में अत्याचार और अनाचार करने लगे।
          1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे तथा बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।
            जनवरी 1900 में  डोम्बरी पहाड़ पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत सी औरतें व बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ साथियों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 मार्च 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। बिरसा को 9 जून 1900 को जेल में ही अंग्रेजों द्वारा जहर देकर मार दिया गया ।
             आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के अधिकांश आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है। अब पूरे भारतवर्ष का आदिवासी समाज बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि मनाता है।  बिरसा मुण्डा की समाधि राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित है। वहीं उनका स्टेच्यू भी लगा है। उनकी स्मृति में रांची में बिरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय विमान तल भी है। किन्तु फिर भी संपूर्ण भारतवर्ष में आज तक बिरसा मुंडा को अनेक लोग नहीं जानते इसलिए उनकी कहानी को पाठ्यक्रम में स्थान देना चाहिए।
              आज 9 जून को इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा वनवासी क्षेत्र के नायक बिरसा मुंडा को विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित।
(रमेशचन्द्र चन्द्रे)