कोरोनाकाल में साहित्य अध्ययन एक औषधी – डॉ. राजेश श्रीवास्तव

8:39 pm or June 10, 2021
कोरोनाकाल में साहित्य अध्ययन एक औषधी - डॉ. राजेश श्रीवास्तव
सौरभ तिवारी
होशंगाबाद १० जून ;अभी तक;  शासकीय गृहविज्ञान स्नातकोत्तर अग्रणी महविद्यालय, होशंगाबाद द्वारा आयोजित किये जा रहे वेबिनार की श्रृंखला में 10 मई 2021 को हिंदी विभाग के द्वारा प्रथम वेबिनार का आयोजन किया गया। इस वेबिनार का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से किया गया। कार्यक्रम का गरिमामय शुभारंभ करते हुये अग्रणी महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. श्रीमती कामिनी जैन ने माँ सरस्वती का पूजन संपन्न किया।
                  इस दौरान डॉ. पुष्पा दुबे, हिंदी विभाग ने भी सहयोग प्रदान किया। प्राचार्य ने हिंदी विभाग द्वारा इतने कम समय में इस वेबिनार के विषय का चयन और आयोजन करने के कार्य के लिए संयोजक और अन्य सदस्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।  साथ ही यह भी कहा कि इस आयोजन में जनभागीदारी की टीम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यदि उनसे कोई त्रुटि होती है तो समस्त महाविद्यालय परिवार क्षमाप्रार्थी है। प्राचार्य ने कहा कि आज की इस हिंदी विभाग की ओर से आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी में अपने अति व्यस्ततम समय में से डॉ. धीरेन्द्र शुक्ला, विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी ने गरिमामयी उपथिति देकर महाविद्यालय को गौरवान्वित किया। उन्होंने बताया कि आज हमारे बीच अतिथि वक्ताओं के रूप में डॉ. केजी मिश्रा, डॉ. आनंद सिंह और डॉ. राजेश श्रीवास्तव हैं जो साहित्य के क्षेत्र के स्तंभ हैं।
              प्राचार्य ने इस बात से भी अवगत कराया कि कोरोना के कारण जहाँ हमारे चारों ओर दुखद वातावरण रहा उसमें भी महाविद्यालय परिवार के सदस्यों ने ऑनलाइन माध्यम से होम आइसोलेशन में रहने वाले लोगों के लिये सकारात्मक संवाद और महाविद्यालय की छात्राओं के लिये वेबिनार का आयोजन सतत किया जा रहा है।
                     महाविद्यालय के हिंदी विभाग से समन्वयक डॉ. पुष्पा दुबे ने विषय प्रवर्तन करते हुये कोरोना काल की त्रासदी को बयान करते हुये कहा कि इस समय लोगों ने बहुत कुछ खोया है। ऐसे समय में साहित्य साहस, संकल्प, आशा और विश्वास जागृत करने का कार्य करता है।
               आज के अतिथि वक्ता डॉ. आनंद सिंह ने सभी का अभिवादन करने के उपरान्त कहा कि साहित्य की भूमिका सदा ही रही है चाहे महामारी हो या ना हो। साहित्य ने हमेशा जाग्रति लाने का कार्य किया है। उन्होंने कविता के माध्यम से बताया कि साहित्य, संगीत और कला के बिना मनुष्य पशु के सामान है।उन्होंने सिल्विया ब्राउन की भविष्यवाणी के बारे में बताया कि सन 2020 में इसी प्रकार की बीमारी के बारे में बताया कि ये अचानक आएगी और अचानक ही चली जायेगी। उन्होंने अपने वक्तव्य में श्रीकांत वर्मा की पंक्तियों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने सिल्विया ब्राउन की भविष्यवाणी के बारे में बताया कि सन 2020 में इसी प्रकार की बीमारी के बारे में बताया कि ये अचानक आएगी और अचानक ही चली जायेगी। उन्होंने अपने वक्तव्य में श्रीकांत वर्मा की पंक्तियों का भी उदाहरण दिया। आज के इस भयपूर्ण वातावरण में निर्भयता का काम करना साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है। वैष्विक स्टार के दुःख वास्तव में ईश्वर के हथौड़े की चोट हैं जो मनुष्य को चेतना के स्तर से ऊपर उठाती हैं। मैला आँचल, निराला, श्रीकांत वर्मा, करन सिंह चौहान आदि ने अपने साहित्य में महमारिओं को अंकित किया है। सभी साहित्यों में यह अंकित है कि जीवन धारा को रोककर सोचने का समय है, स्वयं हो मनुष्यता की ओर अग्रसर करने का।
                अतिथि वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने सबका अभिवादन करते हुये अपने वक्तव्य में कहा कि निदा फाजली जी ने लिखा है कि हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी……… उन्हीं में एक साहित्यकार भी होता है। रामायण का सन्दर्भ लेते हुये उन्होंने मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही जन्म लेता है। साहित्य समाज का दर्पण है और मन को स्वस्थ रखने का काम साहित्य बखूबी करता है। तभी यह कहा जाता है मन के हारे हार है मन के जीते जीत। साहित्य का उद्देश्य है मनुष्य में आशावादी दृष्टिकोण उत्त्पन्न करना है। जिससे महामारी का मजबूती के साथ सामना किया जा सके। उन्होंने बताया कि नोबेल पुरुस्कार विजेता अल्बर्ट कामू ने प्लेग नाम से फ़्रांसिसी उपन्यास लिखा। ऐसे ही अनेक साहित्यकार  जैसे रविंद्र नाथ टैगोर, श्रीकांत वर्मा आदि जिन्होंने महामारी को अपने साहित्य में स्थान दिया है। उन्होंने सभी सदस्यों का आभार प्रकट करते हुये अभी भी कोरोना से सावधान रहने का सुझाव दिया।
                  संगोष्ठी के मुख्य वक्ता रूप में उपस्थित डॉ. के. जी. मिश्रा जी ने पूर्व के दोनों वक्ताओं के विषय वक्तव्य में साहित्य की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि  समाज में जो घटित होता है। साहित्य उसका सृजन करता है। महाभारत के शांति पर्व में बीमारी का प्रभाव दो प्रकार से होता है, वह है शरीर और चेतना। कोई भी चिकित्सा केवल शरीर का उपचार करती है, परन्तु मन का उपचार साहित्य से संभव है। साहित्य मानवीय संवेदनाओं की पुष्टि करता है। हमारे जीवन की सार्थकता इसमें है कि हमें दूसरों के दुःख से हमारी आँखों में आंसू आयें। पंरतु इस महामारी के समय लोग आँसू  बहाने के बजाय व्यापार कर रहे हैं। जिजीविषा प्रबल होगी तभी बीमारी से जीता जा सकता है। जीवन है तो जीवन के साथ सुख और दुःख लगे रहते हैं।
वेबिनार का सफल संचालन कर रही संयोजक डॉ. कीर्ति दीक्षित ने महाविद्यालय द्वारा की गयी प्रशंसा हेतु धन्यवाद ज्ञापित किया।  तदुपरांत सभी अतिथि वक्ताओं का हार्दिक स्वागत किया और उनके द्वारा दिये गये अमूल्य समय हेतु धन्यवाद दिया। उन्होंने सभी वक्ताओं का परिचय देते हुये उन्हें सादर आमंत्रित किया।
आज के वेबिनार की सचिव डॉ. नीतू पवार ने ने सर्वप्रथम ईश्वर का धन्यवाद दिया कि उन्होंने हमें आपदा में भी अवसर प्रदान किया । उन्होंने महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कामिनी जैन मैडम का आभार प्रकट करते हुये कहा कि वे सदा नवाचार को प्रेरित करती हैं। अतिथियों के रूप में उपस्थित डॉ. धीरेन्द्र शुक्ला, डॉ. के. जी. मिश्रा, डॉ. आनंद सिंह और डॉ. राजेश श्रीवास्तव जे का आभार प्रकट करते हुये कहा कि सभी ने अपने व्यस्ततम समय में से इस संगोष्ठी हेतु समय देकर महाविद्यालय परिवार को कृतार्थ किया है। संगोष्ठी में उपस्थित सभी का आभार प्रकट करते हुए कहा कि कि आज की संगोष्ठी को सफल बनाने के लिये हम आपके आभारी हैं।  उन्होंने तकनीकी सहयोगियों डॉ. निशा रिछारिया, श्रीमती आभा वाधवा, देवेंद्र सैनी और मनोज सिसोदिया का आभार प्रकट किया। साथ ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहयोग देने वाले सदस्यों का भी उन्होंने ह्रदय से आभार प्रकट किया। आज की संगोष्ठी में महाविद्यालय परिवार के सभी प्राध्यापक और सदस्यों का भी उन्होंने ह्रदय से आभार माना। अंत में प्राचार्य की अनुमति से इस गरिमामयी संगोष्ठी का समापन किया गया।