धर्म करें, परन्तु उसे प्रचारित-प्रदर्शित नहीं करें-संत श्री आत्मस्वरूपजी

महावीर अग्रवाल 
मन्दसौर ११ सितम्बर ;अभी तक;  श्री सत्संग भवन खानपुरा में चातुर्मास के दौरान श्रीमद् भगवद् गीता का श्रवण कराते हुए पूज्य सन्त श्री आत्मस्वरूप सरस्वतीजी महाराज ने कहा कि सुर दुर्लभ मानव शरीर की महापुरुषों ने खूब प्रशंसा करी ऐसी प्रशंसा किस कारण से करी इस पर विचार मनुष्य नहीं करता। मनुष्य संसार को ठीक करने में जीवन भर लगा ही रहता है अंत में नष्ट हो जाता है। वह नहीं जानता कि यह दुर्लभ जीवन परमात्मा प्राप्ति के लिये है। सत्य बोलो, सत्कर्म करो, नीति पर चलो। चंचल मन को संयमित करके वश में करो, परमात्मा की भक्ति करो। ऐसा बार-बार अभ्यास करते रहे इससे मन सूक्ष्म होता जायेगा। ऐसा होने पर सूक्ष्म तत्व परमात्मा का साक्षात्कार होगा। गीता में शरीर को क्षेत्र (खेत) कहा है। कर्म करने से सुख दुःख प्राप्त होता है। कर्म का फल शरीर के माध्यम से भोगना पड़ता है। शरीर फल भोगने का आश्रय हैं शरीर (क्षेत्र) को आप जानते है। जीव मात्र के शरीर का आधार क्षेत्र उसमें निवासरत आत्म तत्व है। शरीर के अन्दर भी करोड़ों जीव है, कुछ शरीर के लिये अनुकूल है, कुछ प्रतिकूल है, शरीर विकारी है।
            आपने कहा कि शरीर पंचमहाभूतों के सूक्ष्म तत्वों से बना है जिसे तन माया कहते है। सूक्ष्म अहंकार, सूक्ष्म समष्टी बुद्धि। इसी से इन्द्रिया मन भी बनते है। सारा संसार इन्द्रियों का विषय है। मन की इच्छा अनुसार अनुकूल होने पर सुख प्रतिकूल होने पर दुःख होता है। सूक्ष्म स्थूल शरीर के कारण अभिमान होता है। मैं हूँ यह चेतना का आभास होता है।
                संत श्री ने कहा कि साधक को इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए पहला समानता- याने सबको मान मिले स्वयं इसको न चाहें। हमेशा झूकने का स्वभाव बनाये, फल लगी पेड़ की डाली जैसा। सम्मान गुणी का होता है। दूसरा अंकिचन भाव याने अभिमान का त्याग- तप, जप, भजन, ज्ञान, त्याग, वैराग्य, पुत्र परिवार, बल, धन, सम्पत्ति यह सब के अभिमान का त्याग करना। दंभ से रहित-दूसरे के सामने अपने अच्छे कार्यों का स्वयं बखान करना अपने को श्रेष्ठ बताने का भव। धर्म करें, परन्तु उसे प्रचारित या उसका प्रदर्शन नहीं करे। अंतर्यामी परमात्मा सब जानता है, बताने पर पुण्य नष्ट होता है। अहिंसा- किसी को शारीरिक, मानसिक पीड़ा, दुख नहीं पहुंचाये, इससे मन को शांति मिलती है। क्षमा- गलती करने वालों के प्रति क्षमा का भाव रखे। सरलता- गुरू सेवा, गुरू के उपदेश का पालन करे। पवित्रता- शरीर और मन को पवित्र रखे। उक्त साधन करने से साधक मानव उत्तरोत्तर ऊँचा उठते हुए परमात्म तत्व को प्राप्त करते हुए मोक्ष प्राप्त कर लेता है।