–रमेशचन्द्र चन्द्रे
मंदसौर १३ फरवरी ;अभी तक ; रोड फोरलेन हो या सिक्स लेन किन्तु गाड़ी चलाने वाले की एकाग्रता, मानसिक संतुलन एवं दूसरों के प्रति दया एवं सहिष्णुता का भाव ही उसको सही दिशा में गाड़ी चलाने की प्रेरणा देता है अन्यथा दुर्घटना होने पर रोड को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है
इसी प्रकार सरकार सुविधाओं के जंगल खड़े कर सकती है परंतु उसके विवेकपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी तो नागरिकों की ही है।
आजकल के युग में बिना परिश्रम और बिनाा त्याग के सब कुछ प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा, युवक- युवतियों में बलवान होती जा है। एक शानदार बंगला, एक बड़ी कार, एक महंगा मोबाइल, महंगे, कपड़े, पार्लर के खर्चे एवं होटल में पार्टीयां करने के शौक चरम पर है, वहीं भिन्न-भिन्न प्रकार के नशे को ही इन्होंने अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया है। इससे चिंतित होकर किसी ने कहा है कि-
*अपनी इच्छाओं को सीमाओं में बांधेे रखो।*
*वरना, यह शौक गुनाहों में बदल जाएगा।*
शिक्षा का स्तर कितना ही बढ़ जाए आईआईटी, मेडिकल कॉलेज एवं इंजीनियरिंग कॉलेज से कितने ही विद्यार्थी मेरिट स्कॉलर होंगे किंतु वे यदि अपने संस्कारों की गठरी वहाँ डूबो कर केवल समाज और संसार को लूटने के लिए निकलेंगे तो कभी भी, किसी का भला नहीं हो सकता।
इसलिए परिवारों तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों की यह जिम्मेदारी निरंतर बढ़ती जा रही है कि वह संस्कारक्षम योजनाओं को समाज तक पहुंचाएं।
सरकार विकास के नए-नए साधन उपलब्ध कराकर मनुष्य को आगे बढ़ने के रास्ते तो खोल सकती है किंतु उस पर कैसे चलना है?, यह संस्कार तो परिवारों को ही देना पड़ेगा।
इसलिए अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कारित संगठनों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए तथा उन्हें परिवार, समाज, संसार एवं ईश्वर के प्रति निष्ठावान बनाने के लिए रामचरितमानस सहित अन्य धर्म ग्रंथो को अपने जीवन का आधार बनाने का प्रयास कर देना चाहिए तभी समाज की दुष्यप्रवृत्तियों पर नियंत्रण किया जा सकता है।
अन्यथा समाज को सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि सरकार से कभी भी समाज नहीं सुधर सकता बल्कि अच्छे संस्कार ही समाज को सुधार सकते हैं।