-रमेशचन्द्र चन्द्रे
मंदसौर। गरीब अमीर सब की संजीवनी पर मूल्य आसमान पर।
चाय सबको पसंद होती है तथा गरीब से लेकर अमीर तक मजदूर से लेकर मालिक तक के लिए चाय संजीवनी बूटी का काम करती है।
मार्केट में अनेक किस्म की चाय अलग-अलग मूल्य पर उपलब्ध है तथा सभी के स्वाद उसमें मिलाए जाने वाले केमिकल के आधार पर अलग-अलग होते हैं। इन दिनों बाजार में मिक्स चाय बेचने का रिवाज भी चल रहा है जिसके कारण कम मूल्य की चाय की पत्ती को अधिक मूल्य की चाय की पत्ती में मिलाकर उपभोक्ताओं को ठगा जा रहा है।
विगत 5 वर्षों में चाय की पत्ती के मूल्य में दुगनी -तीगुनी वृद्धि हो चुकी है, तथा जो चाय आज से 5 वर्ष पहले 150- 160 में मिलती थी वह अब 400 से ₹500 किलो में बाजार में बिक रही है इसके अतिरिक्त जो ब्रांडेड कंपनियां है वह इससे अधिक मूल्य भी वसूल करती है वर्तमान में रेड लेबल चाय जिसकी कीमत है ₹410 किलो, ताजमहल 640 किलो, बाघ बकरी 560 तथा डबल डायमंड 540 रुपए प्रति किलो में उपलब्ध है जबकि चाय की क्वालिटी के परीक्षण का कोई साधन, जिला खाद्य निरीक्षण विभाग के पास उपलब्ध नहीं है।
हाल ही में भारतीय चाय बोर्ड ने मिलावटी चाय पत्ती को लेकर लोगों को सतर्क किया है। बोर्ड के मुताबिक केमिकल से रंगी हुई चाय पत्ती बाजार में आम हो गई है, चाय की पत्तियों को तैयार करने में कभी-कभी सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल भी किया जाता है जो सेहत के लिए ठीक नहीं है ऐसी खबरें भी आई है कि चाय की पत्तियों को रंग और चमक देने के लिए बिस्मार्क, ब्राउन पोटेशियम, ब्लू हल्दी, इंडिगो, आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है कुल मिलाकर चाय पत्ती का मुद्दा बहुत गंभीर है और यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी खतरनाक है। भारतीय चाय बोर्ड ने “भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण” के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि- किसी भी उत्पाद को बाहरी रंग और हानिकारक पदार्थ से मुक्त होना चाहिए।
चाय अधिनियम 1953 की धारा 4 के अनुसार 1 अप्रैल 1956 को सांविधिक निकाय के रूप में चाय बोर्ड की स्थापना की गई थी। यह बोर्ड चाय उद्योग के समग्र विकास का ध्यान रखता है। इस बोर्ड में अध्यक्ष सहित 30 सदस्य होते हैं जो कि चाय उद्योग के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बोर्ड का प्रधान कार्यालय कोलकाता में स्थित है।
उक्त चाय बोर्ड पूर्णतः नकारा और नाकाम सिद्ध हो रहा है, क्योंकि चाय के मूल्य नियंत्रण में तथा क्वालिटी नियंत्रण में यह बोर्ड पूर्ण तरह असफल है और नकली चाय बाजार में बेची जा रही है, जिस पर जिला खाद्य अधिकारी नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं है। क्योंकि स्थानीय खाद्य अधिकारियों के पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है कि वे नकली चाय का परीक्षण कर सकें। इसलिए वह भी मजबूर हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस और ध्यान देने की फुर्सत नहीं है, जबकि भारत में 80% लोग प्रतिदिन चाय पीते हैं और यहां पर सेकंड तथा थर्ड का माल का खपाया जाता है, जबकि प्रथम श्रेणी की चाय, जिसे कुल उत्पादन का 20% विदेश में निर्यात किया जाता है।
भारत में चाय की पत्ती में मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए निर्यात बंद करना चाहिए तथा भारतीय किसान आयोग एवं विपणन एजेंसियों को भारतीय चाय बोर्ड के साथ मिलकर चाय का मूल्य घटाकर भारतीयों को राहत प्रदान करना आवश्यक है।


