महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ८ जुलाई ;अभी तक ; श्री चैतन्य आश्रम मेनपुरिया में 3 जुलाई से प्रारंभ गुरूपूर्णिमा महोत्सव के अंतर्गत प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से अपरान्ह 2 बजे तक व्यास पीठासीन परम पूज्य स्वामी काष्णीरिषी चैतन्यजी शास्त्री, रमणरेती श्री धाम वृन्दावन के मुखारविन्द से श्री शिवमहापुराण कथा के षष्ठ दिवस कथा प्रसंग में स्वामी जी ने सृष्टि रचना के संबंध में कहा कि भगवान शंकर यागियों के भी महायोगी है। और समस्त देवों के महादेव हैं ब्रह्मा को सृष्टि रचियता, विष्णु को पालनकर्ता और भगवान शंकर को जहां एक तरफ संहारकर्ता कहा गया है वहीं इस सृष्टि को बचाने में भगवान शंकर का ही हाथ रहा है। समुद्रमंथन में अमृत से पहले सबसे पहले जो हलाहल विष निकला था जिसे समस्त सृष्टि स्वाहा हो सकती थी। जिससे समस्त देवता जब भयभीत हो गये तब उस विष का शमन नहीं होता तो सम्पूर्ण सृष्टि जीवन चराचर उस विष से सबकुछ स्वाहा हो सकता था परन्तु भगवान शिव ने उसे पान कर कण्ठ में रोक लिया और निकल कण्ठ कहलाये।
भगवान शंकर को संहारकर्ता जो कहा गया वै वास्तव में भगवान शंकर किसी को मारते, नहीं भगवान शंकर तो ओढ़र दानी है, भोलेनाथ है, सही अर्थ में जो भगवान शंकर का ध्यान भजन करते है भगवान शंकर उनके मन में जन्म जन्मांतर काम क्रोध राग द्वेष आदि विकारों का जो अंतःकरण में भरे होकर दुःखी करते है उनका संहार कर देते है।
पूज्य स्वामी धीरेशानंदजी महाराज ने अज्ञान से जो हमने अपने को शरीर मानकर इसकेा सजाने संवारने में भौतिकता में रचे पचे रहकर दुःखी होते रहते है परन्तु हम शरीर नहीं इस शरीर के रोम रोम को प्रकाशित करने वाली आत्मा है। हमें यह नहं भूलना चाहिये कि पृथ्वी, अग्नि, जलवायु, आकाश इन पांच तत्वों से निर्मित शरीर हम नहीं है।
मंचासीन संतों का सानिध्य प्राप्त हुआ- परमपूज्य स्वामी धीरेशानंदजी महाराज, परम पूज्य युवाचार्य महंत स्वामी मणिमहेश चैतन्यजी महाराज, प.पू. मोहनानंदजी महाराज, परम प.पू. स्वामी कृष्णानंदजी महाराज, प.पू. स्वामी उज्जैनमुनिजी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ।
उपस्थित रहे- कथा यजमान रामप्रताप वकील धर्मपत्नी मथुराबाई टांक कुंचड़ौद, श्री चैतन्य आश्रम मेनपुरिया ट्रस्ट अध्यक्ष प्रहलाद काबरा, सचिव रूपनारायण जोशी, ट्रस्टी बंशीलाल टांक, भेरूलाल सुथार, उदेलाल पडियार भालोट, शिक्षाविद रमेशचन्द्र चन्द्रे, सामाजिक कार्यकर्ता अनील संगवानी, सांवलिया गौशाला सचिव कारूलाल करा, सदस्य छगनलाल बागड़िया, बालचंद मारू आदि।
भगवान शंकर को संहारकर्ता जो कहा गया वै वास्तव में भगवान शंकर किसी को मारते, नहीं भगवान शंकर तो ओढ़र दानी है, भोलेनाथ है, सही अर्थ में जो भगवान शंकर का ध्यान भजन करते है भगवान शंकर उनके मन में जन्म जन्मांतर काम क्रोध राग द्वेष आदि विकारों का जो अंतःकरण में भरे होकर दुःखी करते है उनका संहार कर देते है।
पूज्य स्वामी धीरेशानंदजी महाराज ने अज्ञान से जो हमने अपने को शरीर मानकर इसकेा सजाने संवारने में भौतिकता में रचे पचे रहकर दुःखी होते रहते है परन्तु हम शरीर नहीं इस शरीर के रोम रोम को प्रकाशित करने वाली आत्मा है। हमें यह नहं भूलना चाहिये कि पृथ्वी, अग्नि, जलवायु, आकाश इन पांच तत्वों से निर्मित शरीर हम नहीं है।
मंचासीन संतों का सानिध्य प्राप्त हुआ- परमपूज्य स्वामी धीरेशानंदजी महाराज, परम पूज्य युवाचार्य महंत स्वामी मणिमहेश चैतन्यजी महाराज, प.पू. मोहनानंदजी महाराज, परम प.पू. स्वामी कृष्णानंदजी महाराज, प.पू. स्वामी उज्जैनमुनिजी महाराज का सानिध्य प्राप्त हुआ।
उपस्थित रहे- कथा यजमान रामप्रताप वकील धर्मपत्नी मथुराबाई टांक कुंचड़ौद, श्री चैतन्य आश्रम मेनपुरिया ट्रस्ट अध्यक्ष प्रहलाद काबरा, सचिव रूपनारायण जोशी, ट्रस्टी बंशीलाल टांक, भेरूलाल सुथार, उदेलाल पडियार भालोट, शिक्षाविद रमेशचन्द्र चन्द्रे, सामाजिक कार्यकर्ता अनील संगवानी, सांवलिया गौशाला सचिव कारूलाल करा, सदस्य छगनलाल बागड़िया, बालचंद मारू आदि।


