महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १० जुलाई ;अभी तक ; मानव जीवन में गाय, गंगा (नदी) एवं गुरू तीनों महत्वपूर्ण है। गाय हमें पौष्टिक दूध उपलब्ध कराकर शरीर सुदृढ़ बनाती है। गंगा अर्थात कोई भी नहीं जो पानी उपलब्ध कराती है वह हमंे जल देकर हमारे दैनिक जीवन की आवश्यकता पुरी करती है। गुरू हमें जीवन में सद्मार्ग की ओर प्रवृत्त करते है इसलिये जीवन में इन तीनों का महत्व है हमें इनकी महत्ता समझनी चाहिये।
उक्त उद्गार परम पूज्य पन्यास प्रवर श्री राजरत्नजी म.सा. ने आचार्य श्री निपुणरत्नसूरिश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में रूपचांद आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कहे। अ ापने गुरू पूर्णिमा पर्व पर आयोजित व्याख्यान में कहा कि गंगा अर्थात किसी नदी में स्नान करना हो अर्थात शरीर को निर्मल बनाना हो तो हमें जाना पड़ता है लेकिन चातुर्मास अवधि में गुरू स्वयं हमारे क्षेत्र. में आते है हमें उनका सानिध्य प्राप्त करना चाहिये। जब हम गुरू के सानिध्य केा प्राप्त करते है तो निर्मल वाणी से उनके मार्गदर्शन से हमारा जीवन निर्मल बन जाता है। हमारी आत्मा पापकर्म से रहित अनुभव करती है। इसलिये गुरू की महत्ता को समझो।
संत श्री राजमुनिजी ने कहा कि श्रीकृष्ण भी अपने जीवन में गुरू का महत्व समझते थे, इसी कारण उन्होंने भगवान नेमीनाथजी का कई बार सानिध्य प्राप्त किया। गुरू की कृपा के कारण ही वे अगली 24 बीसी में 12 वें तीर्थंकर होंगे। धर्मसभा के पश्चात् रमेशचन्द्र नरेन्द्रकुमार पोरवाल, बाबूलाल सेठिया, श्रीपाल सेठिया, अशोक सेठिया, रामलाल सेठिया, गोपाल सेठिया, दिनेश सेठिया सभी कपासन की ओर से प्रभावना वितरित हुई।
कई श्रीसंघों ने सहभागिता की- गुरू पूर्णिमा पर आचार्य श्री के दर्शन वंदन एवं प्रवचन श्रवण करने हेतु नीमच, चित्तौड़गढ़, कपासन, उदयपुर, निम्बाहेड़ा, बेगु आदि स्थानों के श्रावक श्राविकाओं ने पहुंचकर धर्मलाभ में सहभागिता की।
उक्त उद्गार परम पूज्य पन्यास प्रवर श्री राजरत्नजी म.सा. ने आचार्य श्री निपुणरत्नसूरिश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में रूपचांद आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में कहे। अ ापने गुरू पूर्णिमा पर्व पर आयोजित व्याख्यान में कहा कि गंगा अर्थात किसी नदी में स्नान करना हो अर्थात शरीर को निर्मल बनाना हो तो हमें जाना पड़ता है लेकिन चातुर्मास अवधि में गुरू स्वयं हमारे क्षेत्र. में आते है हमें उनका सानिध्य प्राप्त करना चाहिये। जब हम गुरू के सानिध्य केा प्राप्त करते है तो निर्मल वाणी से उनके मार्गदर्शन से हमारा जीवन निर्मल बन जाता है। हमारी आत्मा पापकर्म से रहित अनुभव करती है। इसलिये गुरू की महत्ता को समझो।
संत श्री राजमुनिजी ने कहा कि श्रीकृष्ण भी अपने जीवन में गुरू का महत्व समझते थे, इसी कारण उन्होंने भगवान नेमीनाथजी का कई बार सानिध्य प्राप्त किया। गुरू की कृपा के कारण ही वे अगली 24 बीसी में 12 वें तीर्थंकर होंगे। धर्मसभा के पश्चात् रमेशचन्द्र नरेन्द्रकुमार पोरवाल, बाबूलाल सेठिया, श्रीपाल सेठिया, अशोक सेठिया, रामलाल सेठिया, गोपाल सेठिया, दिनेश सेठिया सभी कपासन की ओर से प्रभावना वितरित हुई।
कई श्रीसंघों ने सहभागिता की- गुरू पूर्णिमा पर आचार्य श्री के दर्शन वंदन एवं प्रवचन श्रवण करने हेतु नीमच, चित्तौड़गढ़, कपासन, उदयपुर, निम्बाहेड़ा, बेगु आदि स्थानों के श्रावक श्राविकाओं ने पहुंचकर धर्मलाभ में सहभागिता की।


